परिचय (Introduction) जैसे-जैसे रमज़ान अपने आख़िरी हिस्से में दाख़िल होता है, इबादत का माहौल और ज़्यादा रूहानी हो जाता है। 21वीं रात से आख़िरी अशरा (आख़िरी दस रातें) शुरू होती हैं—और यही रमज़ान का सबसे अफ़ज़ल हिस्सा है। इन्हीं रातों में एक ऐसी रात छुपी है जिसे अल्लाह तआला ने हज़ार महीनों से बेहतर क़रार […]
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प्रस्तावना मुक़द्दस महीने रमज़ान का समापन केवल रोज़े, नमाज़ और इबादत पर नहीं होता, बल्कि इस मुबारक महीने को मुकम्मल बनाने के लिए इस्लाम हमें एक अहम अमल सिखाता है — सदक़ातुल फ़ित्र (फ़ित्रा)। फ़ित्रा सिर्फ़ एक आर्थिक मदद नहीं, बल्कि यह रोज़ों की पाकीज़गी, समाज में बराबरी और ईद की खुशियों को सब तक […]
प्रस्तावना (Introduction) रमज़ान सिर्फ़ रोज़ा रखने का महीना नहीं, बल्कि रूह, दिल और माल की पाकीज़गी का महीना है। जिस तरह रोज़ा इंसान के जिस्म और ख़्वाहिशात को काबू में लाता है, उसी तरह ज़कात इंसान की दौलत को पाक करती है और समाज के कमज़ोर तबक़े के साथ हमदर्दी पैदा करती है। इसी वजह […]
रमज़ान सिर्फ भूख और प्यास का नाम नहीं है, बल्कि यह रूहानी तरबियत, नफ़्स की इस्लाह और दिल की पाकीज़गी का महीना है। इंसान के ज़ाहिरी आमाल (नमाज़, रोज़ा, तिलावत) तभी असरदार होते हैं जब उसका दिल भी साफ़ हो। अगर दिल में बुग़्ज़ (दुश्मनी), हसद (जलन) और नफ़रत भरी हो, तो इबादत की रूह […]
रमज़ान डे 16 🕊️ – अशरा, मग़फ़िरत और तौबा का पैग़ाम रमज़ान सिर्फ रोज़ा रखने का महीना नहीं, बल्कि रूहानी सफ़र है। 16वें रोज़े तक पहुँचते-पहुँचते हम दाख़िल हो चुके होते हैं दूसरे अशरे (अशरा-ए-मग़फ़िरत) में—यानी वह दस दिन जो अल्लाह से माफ़ी माँगने, गुनाहों से तौबा करने और दिल को पाक करने के लिए […]
रोज़ा, डिजिटल फ़ितना और आत्म-शुद्धि रमज़ान सिर्फ भूखे-प्यासे रहने का नाम नहीं है, बल्कि यह आत्मा की ट्रेनिंग का मुकम्मल निज़ाम है। डे 13 पर हम खास तौर पर नफ़्स (अंदरूनी ख़्वाहिशात/इगो) को कंट्रोल करने पर ग़ौर करते हैं—ख़ासकर आज के दौर में जहाँ मोबाइल और सोशल मीडिया का डिजिटल फ़ितना हर वक़्त इंसान को […]
रमज़ान रहमत, बरकत और मग़फ़िरत का महीना है। इस मुबारक महीने में हर नेक अमल का सवाब कई गुना बढ़ा दिया जाता है। इन्हीं नेक कामों में से एक बहुत अज़ीम और अफ़ज़ल अमल है — रोज़ेदार को इफ़्तार करवाना। यह एक ऐसा अमल है जो इंसान को अल्लाह की रज़ा, जन्नत के करीब और […]





