Transliteration: (Laqad khalaqnal insaana fee ahsani taqweem )
इस आयत में अल्लाह तआला इंसान की श्रेष्ठता पर जोर देते हैं, जो मुशरिकों और मुनाफिकों की गलत धारणाओं को खारिज करता है। जबकि मुशरिक पत्थरों, समुद्रों और आकाशीय पिंडों जैसे निर्जीव वस्तुओं की पूजा करते थे और कुछ मुनाफिक जिन और फरिश्तों को अपनी ताकत और इबादत की वजह से श्रेष्ठ मानते थे, अल्लाह यह बताते हैं कि इंसान को सबसे बेहतरीन रूप में बनाया गया है। यह श्रेष्ठता हमें यह समझने के लिए प्रेरित करती है कि हमें अपनी असलियत को समझना चाहिए ताकि हम मुशरिकी और गुनाह से बच सकें और अपने उच्चतम स्वभाव के अनुरूप कार्य करें।
इंसान की श्रेष्ठता को अल्लाह तआला ने छह तरीकों से स्पष्ट किया है:
तक़वीम का मतलब इंसान के शारीरिक रूप और अंदरूनी स्थिति से है। अल्लाह ने इंसान को अपनी शक्ति से अपनी ही हाथों से बनाया, जिससे इंसान अन्य जीवों से अलग और सर्वोत्तम है। "बशर" (इंसान) शब्द का मतलब है कि इंसान को सीधे अल्लाह ने बनाया है, जो इंसान की इज्जत को दर्शाता है।
जब हज़रत जिब्राईल (अलैहि सलाम) नबी मोहम्मद (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) से मिले, तो उन्होंने इंसानी रूप में ही दिखाया, क्योंकि इंसान जिब्राईल के रूप में नमाज़ नहीं पढ़ सकते थे। इंसानी शरीर इबादत के लिए बनाया गया था, और इसके अनुपात और गतियाँ केवल अल्लाह की ताबेदारी के उद्देश्य से हैं।
तक़वीम का मतलब यहाँ शारीरिक अंगों का सही गठन है जो देखने, बोलने, स्वाद लेने और माफी मांगने जैसे कार्यों को संभव बनाता है। दिल भी इंसान के स्वभाव का केंद्र है, जो भावनाओं और समझ का घर है, और यह शरियत के मार्गदर्शन से निर्देशित होता है।
इंसान को अच्छाई और बुराई दोनों के साथ बनाया गया है, जैसे एक घर में बाथरूम और बेडरूम दोनों होते हैं, हालांकि उनके उद्देश्य अलग होते हैं। यह द्वैतता सभी इंसानों में है, और जैसे बाथरूम बेडरूम जैसा नहीं होता, वैसे ही नबी और गैर नबी में अंतर होता है। दोनों के अंग एक जैसे दिख सकते हैं, लेकिन उनका उद्देश्य, महत्व और क्रियाएँ बहुत अलग होती हैं।
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