कुरान - 90:14 सूरह अल-बलद अनुवाद, लिप्यंतरण और तफसीर (तफ्सीर).

14
أَوۡ إِطۡعَٰمٞ فِي يَوۡمٖ ذِي مَسۡغَبَةٖ

Transliteration: (Aw it'aamun fee yawmin zee masghabah )

14. या, भूख के दिन खाना खिलाना [14]। (अनुवाद — मुफ़्ती अहमद यार ख़ान)

मुफ़्ती अहमद यार ख़ान — सूरह अल-बलद आयत 14 तफ़सीर



  • मुफ़्ती अहमद यार ख़ान (तफ़सीर-ए-नईमी)

भूख के दिन (Days of Hunger)

"भूख के दिन" उन कठिन समयों को दर्शाते हैं जब इंसान भूख और कमी का सामना करता है, चाहे वह अकाल (famine) के कारण हो या व्यक्तिगत परेशानियों के कारण। यह आयत हमें सहानुभूति (empathy), दरियादिली (generosity), और निःस्वार्थता (selflessness) के आध्यात्मिक लाभों का पाठ पढ़ाती है।

मुख्य बिंदु (Key Points)

1. बाहरी अर्थ (Literal Meaning)

अकाल के समय (Times of famine):
जब खाने-पीने की चीज़ें कम हों और संसाधनों की कमी हो, ऐसे वक्त में दूसरों के साथ अपना हिस्सा बांटना एक बड़ा नेक काम और दया का इज़हार है।

व्यक्तिगत ज़रूरत के समय (Personal need):
जब खुद इंसान तंगी में हो, तब भी दूसरों की मदद करना और अपनी ज़रूरतों को पीछे रखना बड़ी फज़ीलत (virtue) की बात है।

2. आध्यात्मिक अर्थ (Spiritual Meaning)

रमज़ान का महीना (The Month of Ramadan):
रमज़ान के दौरान भूखे और ज़रूरतमंदों को खाना खिलाने का बहुत बड़ा सवाब (reward) है। रमज़ान में रोज़ा रखने के साथ-साथ खैरात और भलाई के काम इंसान की रूह को पाक (purify) करते हैं और उसे अल्लाह के करीब ले जाते हैं।

नेकी की राह (Path of Righteousness):
तंगी के वक्त दूसरों की मदद करना न सिर्फ़ एक इबादत (worship) है बल्कि आत्मा की तरक्की (spiritual growth) का भी ज़रिया है।

3. नैतिक पाठ (Moral Lesson)

कुर्बानी का जज़्बा (Sacrificing what is dear):
असली दरियादिली तब होती है जब इंसान अपनी ज़रूरत की चीज़ें दूसरों को देता है, न कि अपने बचे हुए या फ़ालतू हिस्से से।

जरूरतमंदों के लिए सहानुभूति (Empathy for the needy):
यह आयत सिखाती है कि हमें दूसरों की तकलीफ़ों को महसूस करना चाहिए और उनके साथ मदद का हाथ बढ़ाना चाहिए। इससे समाज में भाईचारे (community) और इंसानियत (humanity) को बढ़ावा मिलता है।

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