Transliteration: (Wa atee'ul laaha war Rasoola la'allakum turhamoon)
यह आयत स्पष्ट रूप से दर्शाती है कि अल्लाह और उसके रसूल ﷺ की आज्ञा का पालन करना बराबर और अविभाज्य रूप से आवश्यक है। दोनों की आज्ञा मानना अनिवार्य है, और कोई भी व्यक्ति इससे मुक्त नहीं हो सकता यदि वह परहेज़गारी और अल्लाह की रहमत पाना चाहता है। इस आयत से यह भी साबित होता है कि अल्लाह और उसके रसूल ﷺ का संयुक्त उल्लेख इबादत का एक दिव्य आदेश है और यह शिर्क नहीं है। बल्कि, यही इस्लाम का सही रास्ता है, जो क़ुरआन की शिक्षाओं में मज़बूती से जड़ा हुआ है।
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