कुरान - 3:200 सूरह आल-इमरान अनुवाद, लिप्यंतरण और तफसीर (तफ्सीर).

200
يَـٰٓأَيُّهَا ٱلَّذِينَ ءَامَنُواْ ٱصۡبِرُواْ وَصَابِرُواْ وَرَابِطُواْ وَٱتَّقُواْ ٱللَّهَ لَعَلَّكُمۡ تُفۡلِحُونَ

Transliteration: (Yaaa aiyuhal lazeena aamanus biroo wa saabiroo wa raabitoo wattaqul laaha la'allakum tuflihoon)

ऐ ईमान वालों! सब्र करो, दूसरों को सब्र की ताकीद करो, और डटे रहो, और अल्लाह से डरते रहो ताकि तुम कामयाब हो जाओ। [456] (अनुवाद — मुफ़्ती अहमद यार ख़ान)

मुफ़्ती अहमद यार ख़ान — सूरह आल-इमरान आयत 200 तफ़सीर



  • मुफ़्ती अहमद यार ख़ान (तफ़सीर-ए-नईमी)

📖 सूरा आले-इमरान – आयत [200] की तफ़्सीर

 

✅ [456] सब्र, इस्तिक़ामत और तैयारी भी इबादत हैं

इस आयत में, जो सूरा आले-इमरान की आख़िरी आयत है, अल्लाह तआला ईमान वालों को मुश्किल हालात, जंग और ईमानी इम्तिहानों के वक़्त चार अहम बातों की ताकीद फ़रमा रहे हैं:

  • सब्र करो (اصبروا) — अपनी ज़ाती आज़माइशों में मज़बूती से डटे रहो
  • दूसरों को सब्र की ताकीद करो (صابروا) — मिल कर दूसरों को भी हौसला दो
  • मुराबतह करो (رابطوا) — मोर्चों पर डटे रहो, और हर वक्त तैयार रहो
  • अल्लाह से डरते रहो — तक़वा ही हर कामयाबी की बुनियाद है

इससे हमें ये हिकमत मिलती है कि इस्लामी सरहदों की हिफ़ाज़त करना भी इबादत है। मोर्चे पर तैनात रहने वाले मुसलमान हर वक़्त अलर्ट रहते हैं, जो कि अल्लाह के नज़दीक जिहाद की तरह सवाब वाला अमल है। यहां तक कि जिहाद की तैयारी करना — यानी खतरे वाले इलाक़ों में मुस्तैद रहना भी एक इबादत है।

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