Transliteration: (Mataa'un qaleelun summa ma'waahum Jahannam; wa bi'sal mihaad)
यह आयत उस वक्त नाज़िल हुई जब सहाबा किराम ने यह सवाल उठाया कि हम ईमान लाने वाले अल्लाह की राह में तंगी, तकलीफ़ और कुर्बानी सह रहे हैं, जबकि काफ़िर आराम और ऐशो-आराम में जी रहे हैं। इस पर अल्लाह ने यह हक़ीक़त बयान की कि ग़ैर-ईमान वालों की दौलत और ऐश बस थोड़े वक्त का धोखा है — जैसे चीनी लगी ज़हर।
यह कामयाबी न इनाम है, न नेमत — बल्कि इम्तिहान या सज़ा की तरफ़ बढ़ने का एक ज़रिया है। इनका असली अंजाम बहुत ही डरावना है: उनका ठिकाना जहन्नम है, और वह बेहद बुरा ठहरने की जगह है — रुसवाई और अज़ाब से भरी हुई।
सबक़ यह है: काफ़िरों की चमक-धमक को देखकर रश्क न करो, असली और हमेशा की कामयाबी तो ईमान और आख़िरत में है, न कि इस फानी दुनिया की चकाचौंध में।
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