Transliteration: (Fastajaaba lahum Rabbuhum annee laaa Udee'u 'amala 'aamilim minkum min zakarin aw unsaa ba'dukum min ba'din fal lazeena haajaroo wa ukhrijoo min diyaarihim wa oozoo fee sabeelee wa qaataloo wa qutiloo la ukaffiranna 'anhum saiyi aatihim wa la udkhilanna hum Jannnatin tajree min tahtihal anhaaru sawaabam min 'indil laah; wallaahu 'indahoo husnus sawaab)
इस आयत में बताया गया कि अल्लाह ने सच्चे ईमान वालों की दिल से की गई दुआ सुन ली और उसे कबूल भी किया। अल्लाह अपने बंदों की दुआ को सुनता है और इंसाफ़ और रहमत के साथ उसका जवाब देता है। यह इशारा है कि अल्लाह की तरफ़ से कोई जवाब ना आने का मतलब यह नहीं कि दुआ कुबूल नहीं हुई — वह अपने वक़्त और हिकमत से पूरी होती है।
अल्लाह ने साफ़ कह दिया: “मैं तुम में से किसी अमल करने वाले का अमल ज़ाया नहीं करता, चाहे वह मर्द हो या औरत।” इस से ये बातें साबित होती हैं:
इस हिस्से में उन लोगों का ज़िक्र है जिनके लिए अल्लाह ने ख़ास इनाम तय किया:
ऐसे लोगों को अल्लाह दो बड़ी नेमतें देगा:
आख़िर में अल्लाह फ़रमाता है: “…और सबसे बेहतरीन इनाम तो अल्लाह ही के पास है।” इस से हमें ये सीख मिलती है:
ये आयत तस्ली और तश्फ़ीक़ (सांत्वना और हौसला) देती है उन सभी लोगों को जो ईमान की राह में कुर्बानी देते हैं।
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