कुरान - 3:194 सूरह आल-इमरान अनुवाद, लिप्यंतरण और तफसीर (तफ्सीर).

194
رَبَّنَا وَءَاتِنَا مَا وَعَدتَّنَا عَلَىٰ رُسُلِكَ وَلَا تُخۡزِنَا يَوۡمَ ٱلۡقِيَٰمَةِۖ إِنَّكَ لَا تُخۡلِفُ ٱلۡمِيعَادَ

Transliteration: (Rabbanaa wa aatinaa maa wa'attanaa 'alaa Rusulika wa laa tukhzinaa Yawmal Qiyaamah; innaka laa tukhliful mee'aad)

ऐ हमारे रब! हमें वह सब अता फ़रमा जो तूने अपने रसूल के ज़रिए हमसे वादा किया है [442], और क़यामत के दिन हमें ज़लील न कर। बेशक तू अपने वादे के ख़िलाफ़ नहीं करता [443]। (अनुवाद — मुफ़्ती अहमद यार ख़ान)

मुफ़्ती अहमद यार ख़ान — सूरह आल-इमरान आयत 194 तफ़सीर



  • मुफ़्ती अहमद यार ख़ान (तफ़सीर-ए-नईमी)

📖 सूरा आल-इमरान – आयत 194 की तफ़्सीर

 

✅ [442] रसूल के वादे, दरअसल अल्लाह का वादा है

इस आयत से मालूम होता है कि नबी करीम ﷺ ने जो भी वादा किया, वो असल में अल्लाह का वादा है।
इससे हमें ये बातें समझ में आती हैं:

  • जिसे नबी ने जन्नत की खुशखबरी दी, वो अल्लाह के हुक्म से जन्नत का हक़दार है।
  • दुआ करते वक़्त नबी के वादों का ज़िक्र करना अच्छा होता है, क्योंकि इससे दुआ में सच्चाई और उम्मीद बढ़ती है।
    • जैसे तहज्जुद में दुआ करते हुए कहें: “या अल्लाह! तूने अपने रसूल के ज़रिए बताया कि इस वक़्त की दुआ क़बूल होती है, तो हमें माफ़ कर दे।”
  • इस आयत से ये भी पता चलता है कि क़यामत के दिन की ज़िल्लत बहुत सख्त सज़ा है,
    • इसलिए नेक लोग हर वक़्त उस से बचने की दुआ करते हैं, जो उनकी अल्लाह के सामने झुकने की हालत को दिखाता है।

✅ [443] अल्लाह का वादा अटल है — सवाल हमारी क़ाबिलियत का है

आयत का आख़िरी हिस्सा बताता है कि:

  • अल्लाह कभी अपना वादा नहीं तोड़ता।
  • उसका हर वादा पूरा और पक्का होता है — इंसानों की तरह नहीं कि हालात देखकर बदल जाए।
  • डर इस बात का नहीं कि अल्लाह अपना वादा निभाएगा या नहीं,
    • बल्कि डर ये है कि क्या हम उस वादे के लायक़ हैं या नहीं।
  • ये मोमिन की सच्ची फिक्र है — कि अल्लाह सच्चा है, लेकिन हम खुद कमज़ोर और गुनहगार हैं।
  • इसलिए मोमिन की दुआ में ये एहसास होता है: “या अल्लाह! तू हमें उन लोगों में कर दे जो तेरे वादे के हक़दार हैं।”

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