कुरान - 3:192 सूरह आल-इमरान अनुवाद, लिप्यंतरण और तफसीर (तफ्सीर).

192
رَبَّنَآ إِنَّكَ مَن تُدۡخِلِ ٱلنَّارَ فَقَدۡ أَخۡزَيۡتَهُۥۖ وَمَا لِلظَّـٰلِمِينَ مِنۡ أَنصَارٖ

Transliteration: (Rabbanaaa innaka man tudkhilin Naara faqad akhzai tahoo wa maa lizzaalimeena min ansaar)

ऐ हमारे रब! तू जिसे जहन्नम में डाल दे, यक़ीनन तूने उसे ज़लील कर दिया। और ज़ालिमों का कोई मददगार नहीं है [438]। (अनुवाद — मुफ़्ती अहमद यार ख़ान)

मुफ़्ती अहमद यार ख़ान — सूरह आल-इमरान आयत 192 तफ़सीर



  • मुफ़्ती अहमद यार ख़ान (तफ़सीर-ए-नईमी)

📖 सूरा आल-इमरान – आयत 192 की तफ़्सीर

 

✅ [438] जहन्नम सबसे बड़ी बेइज़्ज़ती है

यह आयत उन लोगों की दुआ का सिलसिला है जो अल्लाह को याद करते हैं और उसकी बनाई चीज़ों पर सोचते हैं। अब वो ये मानते हैं कि:
जो भी जहन्नम में गया, वो सबसे ज़्यादा ज़लील हुआ, क्योंकि अल्लाह की रहमत से दूर होना सबसे बड़ी शर्मिंदगी है।

इस आयत में “ज़ालिम” से मुराद अक्सर काफ़िर (इनकार करने वाले) होते हैं — क्योंकि उनका ज़ुल्म ये है कि वो:

  • हक़ को नहीं मानते,
  • अल्लाह के साथ किसी को शरीक करते हैं,
  • और उसके रसूलों को झुठलाते हैं।

ऐसे लोगों का क़यामत के दिन कोई मददगार नहीं होगा,

  • ना कोई सिफ़ारिश करने वाला,
  • ना कोई साथ देने वाला।

✨ इसके उलट: मोमिन अकेला नहीं होता

  • अल्लाह उसका दोस्त होता है,
  • नबी ﷺ उसके रहनुमा और सिफ़ारिश करने वाले होते हैं,
  • नेक लोग, औलिया और फ़रिश्ते भी उसका साथ देते हैं।

कुरआन कहता है: “अल्लाह, उसका रसूल और ईमान वाले ही तुम्हारे दोस्त हैं” (सूरा मायदह, 5:55)
और एक और जगह: “अल्लाह उसका मददगार है, जिबरील, नेक मोमिन और फ़रिश्ते भी उसके साथ हैं” (सूरा तहरीम, 66:4)

इसलिए जिसे अल्लाह की मदद न मिले, वो अल्लाह की नज़रों में गिर चुका होता है — और जिसे अल्लाह की दोस्ती मिले, वो सबसे बड़ा इज़्ज़तदार होता है।

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