Transliteration: (Inna fee khalqis samaawaati wal ardi wakhtilaafil laili wannahaari la Aayaatil liulil albaab)
हदीस में आता है कि नबी करीम ﷺ जब तहज्जुद की नमाज़ के लिए उठते, तो आसमान की तरफ़ देखते और इस आयत से लेकर "मीआद" तक की आयतें पढ़ते। एक बार आपने फ़रमाया कि ये अफ़सोस की बात है कि कोई इन आयतों को पढ़े लेकिन आसमान और ज़मीन के निज़ाम, हिकमत और इल्म पर गौर न करे। इससे मालूम होता है कि इस्लाम इल्म हासिल करने को पसंद करता है, जैसे नक़्शा (geography), सितारों का इल्म (astronomy) और साइंस। जब ये इल्म ईमान के साथ हो, तो ये सवाब का काम बन जाता है। ये सिर्फ़ दुनियावी बातें नहीं, बल्कि अल्लाह की क़ुदरत को समझने का ज़रिया भी हैं।
रात और दिन का बदलना, और आसमान-ज़मीन की बनावट, उन लोगों के लिए साफ़ निशानियाँ हैं जो सोचते हैं। ये अल्लाह की एकता, बड़ा इल्म, और पूरी ताक़त को दिखाते हैं। ये सब चीज़ें बग़ैर मक़सद के नहीं हैं, बल्कि अल्लाह की बनायी हुई तर्ज़ और निज़ाम हैं, जो हमें समझाने और ईमान बढ़ाने के लिए बनाए गए हैं। इन चीज़ों को देखकर इंसान ये भी समझता है कि कौमें भी चढ़ती और गिरती हैं — जैसे रात के बाद दिन आता है। इससे ग़ुरूर तोड़ता है, और इंसान समझता है कि कोई ताक़त हमेशा नहीं रहती, और दुनियावी घमंड बेकार है।
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