Transliteration: (Laa tahsabannal lazeena yafrahoona bimaaa ataw wa yuhibbona ai yuhmadoo bimaa lam yaf'aloo falaa tahsabannahum bimafaazatim minal 'azaabi wa lahum 'azaabun aleem)
इस आयत में उन लोगों की निंदा की गई है जो ऐसे कार्यों पर इतराते हैं जो वास्तव में उन्होंने किए ही नहीं, और फिर भी वे चाहते हैं कि लोग उनकी प्रशंसा करें। इससे यह सीख मिलती है:
किसी कायर को बहादुर कहना या किसी जाहिल को "शम्सुल उलमा" जैसे ऊँचे खिताब देना धोखेबाज़ी है, और यह ग़ैर-मुस्लिमों के आचरण से मिलता-जुलता है।
इसी तरह, जब कोई अज्ञानी खुद को आलिम समझने लगे या धोखे से धार्मिक उपाधियाँ हासिल करे—यह भी एक भयावह बीमारी है जो आज भी आम है।
इस आयत में ऐसे सभी लोगों की भर्त्सना की गई है—चाहे वे झूठी प्रशंसा पाने वाले हों या वो जो झूठी प्रशंसा करते हैं।
यह हिस्सा उन लोगों के लिए भी चेतावनी है जो जानबूझकर लोगों को गुमराह करते हैं, और सत्य को छिपाकर, लोगों को अज्ञान में रखकर, अपनी शोहरत या स्वार्थ के लिए इसका फायदा उठाते हैं।
ऐसे लोग अल्लाह की सज़ा से बिलकुल भी सुरक्षित नहीं हैं।
बल्कि उनके लिए एक दर्दनाक अज़ाब तय है—इसलिए नहीं कि उन्होंने सिर्फ धोखा दिया, बल्कि इसलिए कि उन्होंने दूसरों को जान-बूझकर भटकाया।
For a faster and smoother experience,
install our mobile app now.
संबंधित आयात (विषय) / Related Ayat