Transliteration: (Latublawunna feee amwaalikum wa anfusikum wa latasma'unna minal lazeena ootul Kitaaba min qablikum wa minal lazeena ashrakooo azan kaseeraa; wa in tasbiroo wa tattaqoo fa inna zaalika min 'azmil umoor)
इस आयत में ईमान वालों को पहले से ख़बर दी जा रही है कि उन्हें ज़रूर आज़माया जाएगा:
माल की कमी (जैसे नुक़सान, कारोबार का घाटा, ज़कात जैसी जिम्मेदारियाँ) और
जान की तकलीफ़ें (बीमारी, मौत, दुख)।
यह इम्तिहान जिहाद और इबादत का हिस्सा हैं। अल्लाह पहले ही बता रहा है ताकि जब मुश्किल वक़्त आए, तो ईमान वाले टूटें नहीं, बल्कि सब्र और तैयारी से काम लें।
मुसलमानों को आगाह किया गया है कि उन्हें:
अहले किताब (यहूदी और नसरानी) और
मुशरिकों से बहुत सी तकलीफ़देह बातें सुननी पड़ेंगी।
जैसे:
आख़िर में अल्लाह फ़रमाता है:
अगर तुम सब्र करो और परहेज़गारी अपनाओ, तो यही है मज़बूत इरादा रखने वालों की पहचान।
दो तरह की तफ़्सीरें मिलती हैं:
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