Transliteration: (Kullu nafsin zaaa'iqatul mawt; wa innamaa tuwaffawna ujoorakum Yawmal Qiyaamati faman zuhziha 'anin Naari wa udkhilal Jannata faqad faaz; wa mal hayaatud dunyaaa illaa mataa'ul ghuroor)
"हर प्राणी को मौत का स्वाद चखना है" — यह एक सार्वभौमिक सच्चाई है कि हर मख़लूक़, चाहे इंसान हो, जिन्न हो या फ़रिश्ते — सभी को मरना है। सिर्फ़ अल्लाह तआला ही हैं जो हमेशा ज़िंदा और बाक़ी हैं। यह आयत हमें ज़िंदगी की फ़ानी हक़ीक़त याद दिलाती है कि चाहे कोई कितना भी ताक़तवर या ऊँचे रुतबे वाला क्यों न हो, उसे आख़िरकार मौत का सामना करना होगा।
इस हिस्से में यह बात वाज़ेह की गई है कि असल इनाम या सज़ा हमें क़ियामत के दिन ही पूरी तरह मिलेगी। दुनिया में जो मिल रहा है, वह सिर्फ़ एक नमूना है: नेक लोगों के लिए यह अल्लाह की रहमत है, जैसे किसी सरकारी मुलाज़िम को सफ़र के लिए दिया गया भत्ता। और गुनाहगारों के लिए यह सज़ा एक तरह से इंतज़ारी जेल है, आख़िरी फ़ैसले से पहले की एक मुअत्तली सज़ा। इस आयत से सीख मिलती है कि दुनिया के हालात को आख़िरी फ़ैसला न समझो, असल इंसाफ़ तो आख़िरत में होगा।
आयत के आख़िर में एक गहरी बात कही गई: "यह दुनिया की ज़िंदगी तो बस धोखे की एक चकाचौंध है।" अगर ज़िंदगी सिर्फ़ दुनियावी लुत्फ़ और माद्दी चीज़ों में गुज़ारी जाए, तो वह महज़ एक धोखा है। इसके बरअक्स, परहेज़गार और नेक लोग दुनिया को आख़िरत की तैयारी की जगह समझते हैं। उनके लिए यह ज़िंदगी धोखा नहीं बल्कि एक मक़सद भरी राह है। सच्ची कामयाबी वही है जो जहन्नम से बच जाए और जन्नत में दाख़िल हो जाए।
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