Transliteration: (Allazeena qaalooo innal laaha 'ahida ilainaaa allaa nu'mina liRasoolin hatta ya'tiyanaa biqurbaanin ta kuluhun naar; qul qad jaaa'akum Rusulum min qablee bilbaiyinaati wa billazee qultum falima qataltumoohum in kuntum saadiqeen)
यहूदियों ने गुरूर से कहा कि उन्हें तौरात में हुक्म दिया गया है कि जब तक कोई रसूल आसमान से आग द्वारा खाई जाने वाली क़ुर्बानी न दिखाए, वो ईमान नहीं लाएँगे। उन्होंने हुज़ूर ﷺ से कहा कि चूँकि आपने यह मोजिज़ा नहीं दिखाया, इसलिए हम ईमान नहीं ला सकते। इस आयत के ज़रिये अल्लाह ने इस बहाने को रद्द कर दिया, क्योंकि यह शर्त हर रसूल पर लागू नहीं थी।
आगे जवाब दिया गया कि “तुमसे पहले कई रसूल वाज़ेह निशानियों के साथ आए” — यानी हर नबी कोई न कोई मोजिज़ा लेकर आया, भले ही वह क़ुर्बानी वाली आग न हो। मगर इसके बावजूद यहूदियों ने उन्हें झुठलाया और उन्हें तकलीफ़ दी। इससे साबित होता है कि उनका यह दावा सच्चे ईमान के लिए नहीं था, बल्कि सिर्फ़ बहाना था।
कुछ रसूलों, जैसे हज़रत ज़करिय्या और हज़रत यहया (अलैहिस्सलाम), ने वाक़ई ऐसी क़ुर्बानी पेश की जिसे आग ने खा लिया, फिर भी यहूदियों ने उन्हें क़त्ल कर डाला। इससे उनकी मुनाफ़िक़त ज़ाहिर हो गई — माँगी गई निशानी मिलने के बावजूद उन्होंने इनकार किया।
आयत में फिर उन्हें चैलेंज किया गया: “अगर तुम अपने दावे में सच्चे हो, तो फिर तुमने उन्हें क्यों क़त्ल किया?” इससे साबित हुआ कि उनका ये तर्क महज़ हठधर्मी था। भले ही क़त्ल उनके बाप-दादाओं ने किया हो, लेकिन ये लोग उनकी ताईद और हिमायत करके उसी जुर्म में शरीक हैं।
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