Transliteration: (Laqad sami'al laahu qawlal lazeena qaalooo innal laaha faqeerunw wa nahnu aghniyaaa'; sanaktubu maa qaaloo wa qatlahumul Ambiyaa'a bighairi haqqinw wa naqoolu zooqoo 'azaabal Hareeq)
बुख़्ल का मतलब सिर्फ़ माल छुपाने से नहीं, बल्कि हर वो हक़ अदा न करना है जो इंसानों, रिश्तेदारों या अल्लाह का है। चाहे वो ज़कात हो, माँ-बाप का ख़र्च हो, या किसी यतीम का हक़ — जो इनसे बचता है, वो इसी आयत के लायक है।
यहाँ "जो कुछ अल्लाह ने दिया" कहा गया है, जो सिर्फ़ माल तक सीमित नहीं — इसमें इल्म, पद, ताक़त वग़ैरह सब शामिल हैं। ये सब अल्लाह की अमानतें हैं; अगर इन्हें दूसरों से छुपाया जाए, तो यह ख़यानत कहलाती है।
हदीस के मुताबिक जो ज़कात नहीं देता, उसका माल क़ियामत के दिन एक ज़हरीले साँप की शक्ल में उसके गले में लिपट जाएगा और कहेगा: "मैं हूँ तेरा माल, जिससे तू ज़कात नहीं देता था।" यही बात इस आयत में गले के तौक़ के रूप में कही गई है — यह रुसवाई और अजाब का निशान होगा।
अगर कोई गुनाहों के बावजूद अल्लाह की नेमतें पा रहा है, तो ये ज़रूरी नहीं कि यह रज़ा हो — यह इमतिहान या अजाब भी हो सकता है। उल्टा, अगर गुनाह पर तुरंत सज़ा मिलती है, तो वह रहमत होती है ताकि इंसान तौबा करे। अल्लाह हर नियत और हर अमल को जानता है।
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