कुरान - 3:179 सूरह आल-इमरान अनुवाद, लिप्यंतरण और तफसीर (तफ्सीर).

179
مَّا كَانَ ٱللَّهُ لِيَذَرَ ٱلۡمُؤۡمِنِينَ عَلَىٰ مَآ أَنتُمۡ عَلَيۡهِ حَتَّىٰ يَمِيزَ ٱلۡخَبِيثَ مِنَ ٱلطَّيِّبِۗ وَمَا كَانَ ٱللَّهُ لِيُطۡلِعَكُمۡ عَلَى ٱلۡغَيۡبِ وَلَٰكِنَّ ٱللَّهَ يَجۡتَبِي مِن رُّسُلِهِۦ مَن يَشَآءُۖ فَـَٔامِنُواْ بِٱللَّهِ وَرُسُلِهِۦۚ وَإِن تُؤۡمِنُواْ وَتَتَّقُواْ فَلَكُمۡ أَجۡرٌ عَظِيمٞ

Transliteration: (Maa kaanal laahu liyazaral mu'mineena 'alaa maaa antum 'alaihi hattaa yameezal khabeesa minat taiyib; wa maa kaanal laahu liyutli'akum 'alal ghaibi wa laakinnal laaha yajtabee mir rusulihee mai yashaaa'; fa aaminoo billaahi wa Rusulih; wa in tu 'minoo wa tattaqoo falakum ajrun 'azeem)

अल्लाह मोमिनों को उस हालत पर नहीं छोड़ेगा जिसमें तुम अभी हो, जब तक कि वह नापाक को पाक से अलग न कर दे [403]। और यह अल्लाह की शान के लायक़ नहीं कि वह हर किसी को ग़ैब का इल्म दे [404]। लेकिन अल्लाह अपने पैग़म्बरों में से जिसे चाहे चुनता है [405]। अतः, अल्लाह और उसके रसूलों पर ईमान लाओ, और अगर तुम ईमान लाओ और परहेज़गारी इख़्तियार करो तो तुम्हारे लिए बहुत बड़ा इनाम है [406]। (अनुवाद — मुफ़्ती अहमद यार ख़ान)

मुफ़्ती अहमद यार ख़ान — सूरह आल-इमरान आयत 179 तफ़सीर



  • मुफ़्ती अहमद यार ख़ान (तफ़सीर-ए-नईमी)

📖 सूरा आले-इमरान – आयत 179 की तफ़्सीर

 

✅ [403] अल्लाह सच्चे और मुनाफ़िक़ों में फ़र्क़ करेगा

यह आयत सहाबा-ए-किराम के लिए तसल्ली का पैग़ाम है कि अभी मोमिन और मुनाफ़िक़ एक साथ दिखाई दे रहे हैं, मगर जल्द ही अल्लाह अपने रसूल ﷺ के ज़रिए दोनों के बीच साफ़ फ़र्क़ कर देगा।

  • जो लोग सहाबा पर मुनाफ़िक़ होने का इल्ज़ाम लगाते हैं, वे इस आयत का इन्कार करते हैं।
  • रसूल ﷺ ने अपनी ज़िंदगी में ही सच्चे ईमान वालों और मुनाफ़िक़ों को पहचान लिया था।

✅ [404] नबी को दी गई मुनाफ़िक़ों की पहचान

अल्लाह ने अपने महबूब रसूल ﷺ को मुनाफ़िक़ों को पहचानने की ख़ास सलाहियत दी थी।

  • आपने सार्वजनिक तौर पर उनके नाम बताए।
  • अगर सहाबा मुनाफ़िक़ों को पहचान सकते थे, तो रसूल ﷺ की नज़र कितनी ऊँची होगी!
  • जो कहे कि रसूल ﷺ मुनाफ़िक़ों को नहीं जानते थे, वह इस आयत को झुटलाता है।

✅ [405] ग़ैब का इल्म सिर्फ़ पैग़म्बरों को

"ग़ैब" यानी भविष्य और छुपी हुई बातें—ये इल्म सिर्फ़ उन्हीं को दिया जाता है जिन्हें अल्लाह पसंद करता है, यानी उसके चुने हुए पैग़म्बर।

  • क़ुरआन में है: "ग़ैब का जानने वाला अपने ग़ैब को सिर्फ़ अपने पसंदीदा रसूलों पर ज़ाहिर करता है।" (सूरा जिन्न: 72:26)
  • हाँ, ईमान से साबित unseen चीज़ों (जैसे अल्लाह की सिफ़ात, आख़िरत) पर ईमान फ़र्ज़ है।

✅ [406] वजह-ए-नुज़ूल और नबी ﷺ का इल्म

रसूल ﷺ ने एक बार फ़रमाया कि अल्लाह ने मेरी पूरी उम्मत मुझे दिखा दी और मुझे बताया कि कौन ईमान लाएगा और कौन नहीं।

  • मुनाफ़िक़ों ने इसका मज़ाक उड़ाया।
  • एक ने कहा: "हम दिल से काफ़िर हैं, सिर्फ़ ज़ाहिर में उसे मानते हैं—वो कहता है, वह हमें जानता है!"
  • रसूल ﷺ ने मिम्बर पर खड़े होकर कहा: "मुझसे जो पूछना हो पूछो। मैं क़यामत तक के सारे वाक़ियात जानता हूँ।"
  • अब्दुल्लाह इब्न हुज़ाफ़ा ने अपने बाप का नाम पूछा, आपने फ़रमाया: "हुज़ाफ़ा।"
  • हज़रत उमर फ़ारूक ने ये सुनकर गवाही दी कि: "आप अल्लाह के सच्चे रसूल हैं।"

✅ [407] ईमान और तक़्वा की असली अहमियत

इस आयत से निकलते हैं कुछ बुनियादी अक़ीदे:

  • रसूल ﷺ को क़यामत तक के हर वाक़िये का इल्म अल्लाह ने दिया है।
  • रसूल ﷺ के इल्म-ए-ग़ैब पर शक करना निफ़ाक़ है।
  • आप वो बातें जानते थे जो किसी को मालूम नहीं थीं—जैसे अब्दुल्लाह का असली बाप।
  • हर नबी पर ईमान लाना उतना ही ज़रूरी है जितना अल्लाह पर।
  • रसूल की सिफ़ात (जैसे इल्म-ए-ग़ैब) का इनकार ईमान को ख़तरे में डाल देता है।
  • ईमान के साथ तक़्वा (परहेज़गारी) भी ज़रूरी है—तभी मिलेगा अल्लाह की तरफ़ से बड़ा इनाम।

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