Transliteration: (Wa laa yahsabannal lazeena kafarooo annamaa numlee lahum khairulli anfusihim; innamaa numlee lahum liyazdaadooo ismaa wa lahum 'azaabum muheen)
इस आयत में एक ग़लतफहमी दूर की जा रही है कि लंबी उम्र और दुनियावी राहत हमेशा अल्लाह की रहमत का निशान होती है। हक़ीक़त यह है कि अगर लंबी ज़िंदगी नेकियों में गुज़रे तो रहमत है, लेकिन अगर कोई काफ़िर या गुनाहगार ग़लत राह पर चलता रहे, तो लंबी उम्र उसके लिए और ज़्यादा गुनाह कमाने और अज़ाब बढ़ाने का ज़रिया बन जाती है।
मोमिन के लिए लंबी उम्र बख़्शिश और नेकियों का मौका है, लेकिन काफ़िर के लिए यह इलाही सज़ा का एक हिस्सा है।
एक नर्म मगर अहम इशारा भी इसमें मौजूद है: अगर कुफ़्र और गुनाह करने वाले को दुनियावी फायदा या लंबी उम्र मिल सकती है, तो फिर नेकियों और इबादत करने वालों को बारक़त और रहमत मिलना कहीं ज़्यादा लाज़मी है।
यहाँ तक कि शैतान को भी लंबी ज़िंदगी मिली—मगर बतौर इनाम नहीं, बल्कि ताकि वह दूसरों को बहकाए और खुद की हलाकत का सामान तैयार करे।
इस आयत में बताया गया कि काफ़िरों के लिए जो अज़ाब है, वह सिर्फ जिस्मानी तकलीफ़ नहीं, बल्कि सरेआम रुसवाई और जिल्लत से भी भरा होगा।
क़यामत के दिन काफ़िरों को लोगों के सामने ज़लील किया जाएगा, जबकि गुनहगार मोमिनों पर अल्लाह की रहमत का साया होगा। उनके गुनाहों का हिसाब परदे में लिया जाएगा, जिससे उनकी इज़्ज़त महफ़ूज़ रहेगी।
यह फ़र्क़ दिखाता है कि अल्लाह मोमिनों—even गुनहगारों—पर भी ख़ास रहमत करता है, जब कि काफ़िरों को पूरी जिल्लत और अज़ाब झेलना पड़ेगा।
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