Transliteration: (Fa in kaz zabooka faqad kuz ziba Rusulum min qablika jaaa'oo bilbaiyinaati waz Zuburi wal Kitaabil Muneer)
इस आयत के ज़रिये हज़रत मुहम्मद ﷺ को तसल्ली दी गई है कि इनकार और तक़ज़ीब (झुठलाना) कोई नई बात नहीं है। पहले के नबी भी अपनी क़ौमों के हाथों इसी रवैये का शिकार हुए। आप ﷺ से कहा गया कि सब्र करें, जैसे पिछले रसूलों ने किया था। मगर यह भी वाज़ेह कर दिया गया कि हज़रत मुहम्मद ﷺ का सब्र सबसे आला और बे-मिसाल है, क्योंकि आपने मक्का के मुश्रिकों के हाथों जो तकलीफ़ें, गालियाँ, जुल्म और तशद्दुद सहन किए, फिर भी उन्हें माफ़ कर दिया — यह अल्लाह की रहमत का बेहतरीन नमूना है।
इस हिस्से में बताया गया कि पिछले नबियों को भी तीन चीज़ें दी गईं:
इस आयत से यह समझ आता है कि काफ़िर हमेशा से ही रसूलों की तक़ज़ीब करते आए हैं, चाहे उनके पास कितने ही मोजिज़े और किताबें क्यों न हों। लिहाज़ा, हज़रत मुहम्मद ﷺ को चाहिए कि वो ऐसे लोगों के इनकार से मायूस न हों।
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