कुरान - 3:184 सूरह आल-इमरान अनुवाद, लिप्यंतरण और तफसीर (तफ्सीर).

184
فَإِن كَذَّبُوكَ فَقَدۡ كُذِّبَ رُسُلٞ مِّن قَبۡلِكَ جَآءُو بِٱلۡبَيِّنَٰتِ وَٱلزُّبُرِ وَٱلۡكِتَٰبِ ٱلۡمُنِيرِ

Transliteration: (Fa in kaz zabooka faqad kuz ziba Rusulum min qablika jaaa'oo bilbaiyinaati waz Zuburi wal Kitaabil Muneer)

अगर वे आपको झुठलाते हैं (ऐ मुहम्मद ﷺ), तो आपसे पहले भी बहुत से रसूल झुठलाए जा चुके हैं, जो साफ़ निशानियाँ, ज़िक्र वाली किताबें और चमकता हुआ क़ुरआन लेकर आए थे [419] [420]। (अनुवाद — मुफ़्ती अहमद यार ख़ान)

मुफ़्ती अहमद यार ख़ान — सूरह आल-इमरान आयत 184 तफ़सीर



  • मुफ़्ती अहमद यार ख़ान (तफ़सीर-ए-नईमी)

📖 सूरा आल-इमरान – आयत 184 की तफ़्सीर

 

✅ [419] इनकार के मुक़ाबले सब्र की तालीम

इस आयत के ज़रिये हज़रत मुहम्मद ﷺ को तसल्ली दी गई है कि इनकार और तक़ज़ीब (झुठलाना) कोई नई बात नहीं है। पहले के नबी भी अपनी क़ौमों के हाथों इसी रवैये का शिकार हुए। आप ﷺ से कहा गया कि सब्र करें, जैसे पिछले रसूलों ने किया था। मगर यह भी वाज़ेह कर दिया गया कि हज़रत मुहम्मद ﷺ का सब्र सबसे आला और बे-मिसाल है, क्योंकि आपने मक्का के मुश्रिकों के हाथों जो तकलीफ़ें, गालियाँ, जुल्म और तशद्दुद सहन किए, फिर भी उन्हें माफ़ कर दिया — यह अल्लाह की रहमत का बेहतरीन नमूना है।

✅ [420] सुहुफ़, किताबें और चमकता हुआ नूर

इस हिस्से में बताया गया कि पिछले नबियों को भी तीन चीज़ें दी गईं:

  • साफ़ निशानियाँ — यानि ऐसे मोजिज़े (चमत्कार) जो किसी तरह झुठलाए नहीं जा सकते थे।
  • सुहुफ़ — छोटे-छोटे इल्लाही पर्चे या रिसाले जिनमें इबादत के तरीक़े और शरीअत के हुक्म होते थे। हदीसों के मुताबिक़ तक़रीबन 100 सुहुफ़ पिछली उम्मतों में नाज़िल हुए।
  • चमकता हुआ किताब — इससे मुराद हैं मुकम्मल आसमानी किताबें जैसे तौरात और इंजील।

इस आयत से यह समझ आता है कि काफ़िर हमेशा से ही रसूलों की तक़ज़ीब करते आए हैं, चाहे उनके पास कितने ही मोजिज़े और किताबें क्यों न हों। लिहाज़ा, हज़रत मुहम्मद ﷺ को चाहिए कि वो ऐसे लोगों के इनकार से मायूस न हों।

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