Transliteration: (Wa iz akhazal laahu meesaaqal lazeena ootul Kitaaba latubaiyinunnahoo linnaasi wa laa taktumoona hoo fanabazoohu waraaa'a zuhoorihim washtaraw bihee samanan qaleelan fabi'sa maa yashtaroon)
इस आयत में उन उलमा का ज़िक्र है जो यहूद व नसारा में से थे। उनसे यह अहद लिया गया था कि वे अल्लाह की किताब की बातों को लोगों तक साफ़-साफ़ पहुंचाएँगे और उसे छुपाएँगे नहीं। यह अहद या तो 'अहद-ए-अलस्त' के वक़्त लिया गया था, या फिर तौरात में यह हुक्म दर्ज था। मगर उन्होंने इस फ़र्ज़ को निभाया नहीं।
यहां से दो अहम बातें मालूम होती हैं:
दीन को छुपा कर जो भी दुनियावी फायदा मिले, वह बहुत मामूली और फानी है।
और दीन के हुक्म को छुपाना या बदल देना, दरअसल अल्लाह के पैग़ाम के साथ खिलवाड़ है।
⚠️ एक ज़रूरी वज़ाहत:
यह आयत उन लोगों के लिए नहीं जो:
इस आयत में साफ़ चेतावनी दी गई है कि इल्मी बातों को छुपाना हराम है। उलमा का फ़र्ज़ है कि वे हिदायत फैलाएँ और लोगों की रहनुमाई करें।
साथ ही:
उलमा को अपनी पहचान, लिबास और अदब में भी वक़ार रखना चाहिए।
आम लोगों की तरह घुल-मिल कर रहना, या अपनी पहचान छुपाना, या लोगों की पूछताछ से बचना, भी इल्म छुपाने के दायरे में आ सकता है।
इसलिए उलमा का ज़िम्मा है कि वे दीन की सही तालीम दें, और लोगों के लिए हिदायत का ज़रिया बनें।
For a faster and smoother experience,
install our mobile app now.
संबंधित आयात (विषय) / Related Ayat