कुरान - 3:187 सूरह आल-इमरान अनुवाद, लिप्यंतरण और तफसीर (तफ्सीर).

187
وَإِذۡ أَخَذَ ٱللَّهُ مِيثَٰقَ ٱلَّذِينَ أُوتُواْ ٱلۡكِتَٰبَ لَتُبَيِّنُنَّهُۥ لِلنَّاسِ وَلَا تَكۡتُمُونَهُۥ فَنَبَذُوهُ وَرَآءَ ظُهُورِهِمۡ وَٱشۡتَرَوۡاْ بِهِۦ ثَمَنٗا قَلِيلٗاۖ فَبِئۡسَ مَا يَشۡتَرُونَ

Transliteration: (Wa iz akhazal laahu meesaaqal lazeena ootul Kitaaba latubaiyinunnahoo linnaasi wa laa taktumoona hoo fanabazoohu waraaa'a zuhoorihim washtaraw bihee samanan qaleelan fabi'sa maa yashtaroon)

और (याद करो) जब अल्लाह ने किताब वालों से अहद लिया [427] कि “तुम इस (किताब) को लोगों के सामने ज़रूर बयान करोगे और इसे छुपाओगे नहीं।” मगर उन्होंने उसे अपनी पीठों के पीछे फेंक दिया और बदले में थोड़ी क़ीमत ले ली [428], तो उन्होंने बहुत ही बुरा सौदा किया [429]। (अनुवाद — मुफ़्ती अहमद यार ख़ान)

मुफ़्ती अहमद यार ख़ान — सूरह आल-इमरान आयत 187 तफ़सीर



  • मुफ़्ती अहमद यार ख़ान (तफ़सीर-ए-नईमी)

📖 सूरा आल-इ-इमरान – आयत [187] की तफ़्सीर

 

✅ [427] अहले-किताब के उलमा से लिया गया अहद

इस आयत में उन उलमा का ज़िक्र है जो यहूद व नसारा में से थे। उनसे यह अहद लिया गया था कि वे अल्लाह की किताब की बातों को लोगों तक साफ़-साफ़ पहुंचाएँगे और उसे छुपाएँगे नहीं। यह अहद या तो 'अहद-ए-अलस्त' के वक़्त लिया गया था, या फिर तौरात में यह हुक्म दर्ज था। मगर उन्होंने इस फ़र्ज़ को निभाया नहीं।

✅ [428] दीन को दुनिया के बदले बेचना

यहां से दो अहम बातें मालूम होती हैं:
दीन को छुपा कर जो भी दुनियावी फायदा मिले, वह बहुत मामूली और फानी है।
और दीन के हुक्म को छुपाना या बदल देना, दरअसल अल्लाह के पैग़ाम के साथ खिलवाड़ है।

⚠️ एक ज़रूरी वज़ाहत:
यह आयत उन लोगों के लिए नहीं जो:

  • कुरआन छापते हैं,
  • पढ़ाने पर तनख़्वाह लेते हैं,
  • इमामत या मदरसे में तालीम देते हैं।
    बल्कि ये काम दीन को फैलाने और हिफ़ाज़त के लिए जायज़ हैं, बशर्ते उसमें हक़ को छुपाया न जाए।

✅ [429] इल्म छुपाने का गुनाह

इस आयत में साफ़ चेतावनी दी गई है कि इल्मी बातों को छुपाना हराम है। उलमा का फ़र्ज़ है कि वे हिदायत फैलाएँ और लोगों की रहनुमाई करें।

साथ ही:
उलमा को अपनी पहचान, लिबास और अदब में भी वक़ार रखना चाहिए।
आम लोगों की तरह घुल-मिल कर रहना, या अपनी पहचान छुपाना, या लोगों की पूछताछ से बचना, भी इल्म छुपाने के दायरे में आ सकता है।

इसलिए उलमा का ज़िम्मा है कि वे दीन की सही तालीम दें, और लोगों के लिए हिदायत का ज़रिया बनें।

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