कुरान - 3:193 सूरह आल-इमरान अनुवाद, लिप्यंतरण और तफसीर (तफ्सीर).

193
رَّبَّنَآ إِنَّنَا سَمِعۡنَا مُنَادِيٗا يُنَادِي لِلۡإِيمَٰنِ أَنۡ ءَامِنُواْ بِرَبِّكُمۡ فَـَٔامَنَّاۚ رَبَّنَا فَٱغۡفِرۡ لَنَا ذُنُوبَنَا وَكَفِّرۡ عَنَّا سَيِّـَٔاتِنَا وَتَوَفَّنَا مَعَ ٱلۡأَبۡرَارِ

अनुवाद -

ऐ हमारे रब! बेशक हमने एक पुकारने वाले (हज़रत मुहम्मद ﷺ) को सुना [439], जो ईमान की तरफ़ बुला रहा था: “अपने रब पर ईमान लाओ।” तो हमने ईमान ले लिया [440]। ऐ हमारे रब! हमारे गुनाह माफ़ कर दे, हमारी बुराइयाँ मिटा दे, और हमें नेक लोगों के साथ मौत दे [441]।

सूरह आल-इमरान आयत 193 तफ़सीर


📖 सूरा आल-इमरान – आयत 193 की तफ़्सीर

 

✅ [439] नबी की पुकार और उलमा की ज़िम्मेदारी

यहाँ “पुकारने वाला” से मुराद साफ़ तौर पर रसूलुल्लाह ﷺ हैं। इससे ये मालूम होता है:

  • जो उलमा हक़ और सुन्नत के मुताबिक़ बात करें, उनका बुलाना नबी की दावत का सिलसिला है।
  • ऐसे उलमा की बात सुनना, नबी ﷺ की बात सुनने जैसा है
  • हमें जो ईमान की दौलत मिली है, वो नबी की बरकत से मिली है।

✅ [440] दो अहम बातें

इस हिस्से से हमें दो बातें समझ में आती हैं:

  1. मुसलमान को अपने गुनाह मानने चाहिए, लेकिन कभी अपने आप को काफ़िर नहीं कहना चाहिए
    • ऐसा कहना ख़ुद कुफ़्र होता है।
  2. अपने ईमान को वसीला बना कर दुआ करना जायज़ है
    • जब ईमान के ज़रिए दुआ की जा सकती है, तो नबी करीम ﷺ को भी वसीला बना कर अल्लाह की रहमत माँगी जा सकती है।

✅ [441] नेक लोगों के साथ मौत की दुआ

आयत के आख़िर में नेक लोगों के साथ मौत माँगी गई है। इससे हमें सिखना चाहिए कि:

  • हमें दुआ करनी चाहिए कि हमारी मौत नेक लोगों के साथ हो,
    • या तो हक़ीक़त में उनकी सोहबत में,
    • या कोई अच्छा काम करते हुए
  • इसका ये मतलब भी हो सकता है: “जब ज़मीन पर सिर्फ़ बुरे लोग रह जाएँ, उससे पहले हमें उठा ले।”
    • ये एक हदीस से भी साबित है कि क़यामत से पहले अल्लाह अच्छे लोगों को दुनिया से उठा लेगा, ताकि बुरे ही बाक़ी रह जाएँ।

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