कुरान - 3:199 सूरह आल-इमरान अनुवाद, लिप्यंतरण और तफसीर (तफ्सीर).

199
وَإِنَّ مِنۡ أَهۡلِ ٱلۡكِتَٰبِ لَمَن يُؤۡمِنُ بِٱللَّهِ وَمَآ أُنزِلَ إِلَيۡكُمۡ وَمَآ أُنزِلَ إِلَيۡهِمۡ خَٰشِعِينَ لِلَّهِ لَا يَشۡتَرُونَ بِـَٔايَٰتِ ٱللَّهِ ثَمَنٗا قَلِيلًاۚ أُوْلَـٰٓئِكَ لَهُمۡ أَجۡرُهُمۡ عِندَ رَبِّهِمۡۗ إِنَّ ٱللَّهَ سَرِيعُ ٱلۡحِسَابِ

Transliteration: (Wa inna min Ahlil Kitaabi lamai yu'minu billaahi wa maaa unzila ilaikum wa maaa unzila ilaihim khaashi 'eena lillaahi laa yashtaroona bi Aayaatil laahi samanan qaleelaa; ulaaa'ika lahum ajruhum 'inda Rabbihim; innal laaha saree'ul hisaab)

और निश्चय ही किताब वालों में कुछ ऐसे लोग भी हैं जो अल्लाह पर ईमान रखते हैं [453], और जो कुछ तुम्हारी ओर उतारा गया तथा जो कुछ उनकी ओर उतारा गया, उस पर भी ईमान रखते हैं, और वे अल्लाह के सामने विनम्र रहते हैं। वे अल्लाह की आयतों को तुच्छ मूल्य पर नहीं बेचते [454]। यही लोग हैं जिनका प्रतिफल उनके पालनहार के पास है; निःसंदेह अल्लाह जल्द हिसाब लेने वाला है [455]। (अनुवाद — मुफ़्ती अहमद यार ख़ान)

मुफ़्ती अहमद यार ख़ान — सूरह आल-इमरान आयत 199 तफ़सीर



  • मुफ़्ती अहमद यार ख़ान (तफ़सीर-ए-नईमी)

📖 सूरा आले-इमरान – आयत 199 की तफ़्सीर

 

✅ [453] सच्चे मोमिन अहले-किताब

इस आयत में यह स्पष्ट किया गया है कि अहले-किताब में कुछ लोग सच्चे ईमान वाले होते हैं। वे न केवल अल्लाह पर, बल्कि हज़रत मुहम्मद ﷺ पर उतरी कुरआन पर भी ईमान रखते हैं, और अपनी किताबों पर भी, बशर्ते उन्होंने उनमें कोई तहरीफ़ न की हो। यह सबूत है कि सभी यहूदी और ईसाई गुमराह नहीं हैं। हज़रत अब्दुल्लाह बिन सलाम और हज़रत काअब अहबार (रज़ियल्लाहु अन्हुमा) जैसे लोग अपने समय के सबसे बड़े आलिम थे और उन्होंने इस्लाम स्वीकार किया।

इस आयत से यह भी सिद्ध होता है कि अल्लाह पर सच्चा ईमान लाने के लिए अंतिम नबी ﷺ पर ईमान लाना अनिवार्य है, क्योंकि किसी एक रसूल का इनकार करना, अल्लाह का इनकार करने के समान है।

✅ [454] कारणे-वुह्य – नेगस बादशाह की जनाज़ा-नमाज़

यह आयत हब्शा के ईसाई बादशाह ‘नजाशी’ (अस्हमा) की मृत्यु पर नाज़िल हुई। उन्होंने मुसलमानों की हिजरत के समय उनका समर्थन किया और गुप्त रूप से इस्लाम कुबूल किया। जब उनकी मृत्यु की ख़बर मदीना पहुँची, तो रसूलुल्लाह ﷺ ने जन्नतुल बक़ी में उनकी ग़ायबाना जनाज़ा नमाज़ अदा की।

कुछ मुश्रिकों ने इसका मज़ाक उड़ाया कि आपने उन्हें कभी देखा नहीं, फिर जनाज़ा कैसे पढ़ा? इस पर यह आयत उतरी, जिससे सिद्ध होता है कि जो अहले-किताब सच्चे ईमान लाते हैं, वे भी अज्र के पात्र हैं, और उनकी जनाज़ा नमाज़ अदा की जा सकती है, भले ही शव मौजूद न हो।

📚 इसके हवालों में शामिल हैं: सहीह बुख़ारी (किताबुल जना'इज़), सहीह मुस्लिम, तफ़्सीर इब्ने कसीर, तारीख़ अल-तबरी, और अल-मावर्दी की 'अहकाम अल-सुल्तानिय्या'।

✅ [455] हिसाब का तेज़ी से होना

“अल्लाह जल्दी हिसाब लेने वाला है” – यह बात सुनने में विरोधाभासी लग सकती है क्योंकि क़ुरआन में यौमुल-क़ियामह को पचास हज़ार वर्षों का बताया गया है। लेकिन इसका मतलब यह है:

अल्लाह सभी इंसानों और जिन्नों का हिसाब बहुत तेज़ी और आसानी से लेगा, चाहे वे कितने भी हों।

बक़ी का समय अल्लाह की तारीफ़, तजल्ली और रसूल ﷺ की शान-ए-आज़म दिखाने के लिए है। एक शायर ने ख़ूबसूरती से कहा:

"क़ियामत बस इसलिए है कि इंसान खुदा की जलाल को देखे।"

इस प्रकार, हिसाब की तेज़ी अल्लाह की अद्ल (इंसाफ़) को दर्शाती है, और दिन की लंबाई रसूल ﷺ की शान और अल्लाह की महानता को ज़ाहिर करती है।

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