Transliteration: (Al haaku mut takathur )
बनी अब्द मनाफ़ और बनी सहम के बीच वंश की श्रेष्ठता को लेकर बहस हुई। दोनों पक्ष यह दावा कर रहे थे कि वे संपत्ति, व्यवसाय, मेहमाननवाज़ी, प्रतिष्ठा और संख्या में एक-दूसरे से अधिक हैं। जब संख्या में बनी अब्द मनाफ़ की बढ़त दिखी, तो बनी सहम ने सुझाव दिया कि जीवित और मृत व्यक्तियों को मिलाकर गिनती की जाए। उनका कहना था कि यदि हमारे मृतकों को भी जोड़ा जाए, तो हमारी संख्या आपसे अधिक हो जाएगी। इसके बाद वे कब्रिस्तान गए और कब्रों की ओर इशारा करते हुए कहने लगे कि अमुक व्यक्ति इतने महान थे। इसी पर यह आयत नाज़िल हुई (तफ़सीर अज़ीज़ी, रूहुल बयां)।
इस आयत में यह बताया गया है कि इंसान को मौत और क़ब्र की चिंता होनी चाहिए। यह चिंता क़यामत के दिन का डर, अल्लाह तआला की इताअत (आज्ञाकारिता) और उनकी याद में होनी चाहिए। जो भी चीज़ इंसान को अल्लाह और उनके प्यारे रसूल की याद से गाफ़िल कर दे, वह "लह्व" कहलाती है।
अल्हा शब्द "लह्व" से लिया गया है, जिसका अर्थ है गाफ़िल होना या लापरवाह हो जाना।
तकासुर शब्द का अर्थ है "अधिकता" और यह उस समय प्रयोग होता है जब एक-दूसरे के सामने अपनी अधिकता को जताया जाए या उसकी इच्छा की जाए।
दीन की अधिकता की इच्छा बेहतरीन चीज़ है, लेकिन दुनिया की अधिकता की लालसा एक बुरी चीज़ है, ख़ासकर जब यह अल्लाह तआला से ग़फलत का कारण बन जाए। इस आयत में "तकासुर" इसी नकारात्मक भावना को व्यक्त करता है।
बनी अब्द मनाफ़ और बनी सहम कब्रिस्तान गए और मृतकों की कब्रों की ओर इशारा करते हुए कहने लगे कि ये हमारे बड़े और महान लोग थे। उन्होंने अपनी संख्या बढ़ाने के लिए मृतकों को गिनना शुरू कर दिया। इस पर कुरआन की यह आयत नाज़िल हुई, जिसमें बताया गया कि इस तरह की संख्या की होड़ इंसान को ग़फलत में डाल देती है।
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