कुरान - 38:69 सूरह साद अनुवाद, लिप्यंतरण और तफसीर (तफ्सीर).

69
مَا كَانَ لِيَ مِنۡ عِلۡمِۭ بِٱلۡمَلَإِ ٱلۡأَعۡلَىٰٓ إِذۡ يَخۡتَصِمُونَ

Transliteration: (Maa kaana liya min 'ilmin bil mala'il a'laaa iz yakhtasimoon)

मुझे आलम-ए-बाला (ऊँचे फ़रिश्तों की मजलिस) का क्या इल्म था [121] जब वे आपस में तकरार कर रहे थे [122]! (अनुवाद — मुफ़्ती अहमद यार ख़ान)

मुफ़्ती अहमद यार ख़ान — सूरह साद आयत 69 तफ़सीर



  • मुफ़्ती अहमद यार ख़ान (तफ़सीर-ए-नईमी)

सूरह साद तफ़सीर - आयत 69

"मुझे आलम-ए-बाला (ऊँचे फ़रिश्तों की मजलिस) का क्या इल्म था [121] जब वे आपस में तकरार कर रहे थे [122]!"

[121] इल्मे ग़ैब ब-ज़रिए वही

हुज़ूर ﷺ ने फ़रमाया कि मुझे इंसान की पैदाइश से पहले की उन आसमानी बातों का ज़ाती या दुनियावी तौर पर कैसे इल्म हो सकता था? यह सिर्फ़ अल्लाह की अता और वही है जो मेरी सच्ची नबूवत की वाज़ेह दलील है।

[122] फ़रिश्तों की तकरार (मला-ए-आला)

हदीस शरीफ़ में आता है कि अल्लाह तआला ने हुज़ूर ﷺ से दरयाफ़्त फ़रमाया: "मला-ए-आला (फ़रिश्ते) किस बात पर बहस कर रहे हैं?" जब अल्लाह ने हुज़ूर ﷺ को इल्म अता फ़रमाया तो ज़मीन व आसमान की हर चीज़ आपके सामने रौशन हो गई। फ़रिश्तों की बहस कफ़्फ़ारात (गुनाह मिटाने वाले आमाल) पर थी—जैसे नमाज़ के बाद मस्जिद में ठहरना, बा-जमाअत नमाज़ के लिए पैदल चलना और सख़्त सर्दी में कामिल वुज़ू करना।

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