Transliteration: (Innal insaana lafee khusr )
ज़िंदगी की असली पूंजी का नुक़सान (Wasting Life's True Capital)
यह भाग यह बताता है कि इंसान अपने असली जीवन की पूंजी को नफ़रत, ग़लत काम, लापरवाही, और दुनियावी सुखों जैसे खेल और तमाशों के पीछे भागकर बर्बाद कर रहा है। ऐसा इंसान अपनी ज़िंदगी को आने वाले बेहतर आख़िरत के लिए तैयार करने में विफल रहता है।
ज़िंदगी को एक व्यापारी की दुकान के रूप में समझना (Life as a Merchant's Shop)
यह मिसाल दी जाती है कि इंसान एक व्यापारी की तरह है और ज़िंदगी उसकी दुकान है, जहाँ अच्छे या बुरे काम उसके माल हैं। अगर उसके काम अच्छे हैं, तो ख़रीदार अल्लाह तआला हैं, और इन कामों की कीमत जन्नत है। जैसा कि अल्लाह तआला फरमाता है: "बेशक, अल्लाह ने मोमिनों से उनकी जान और उनकी संपत्ति खरीद ली है" (सूरह 9: आयत 111)।
बुरे काम और उनके परिणाम (Evil Deeds and Their Consequences)
वहीं, अगर इंसान के काम बुरे हैं, तो उसका ख़रीदार शैतान होता है, और इसके बदले उसे जहन्नम की सजा मिलती है। यह मिसाल आगे यह भी बताती है कि जैसे शराब की दुकान पर जाने वाला ग्राहक नशेड़ी होता है, वैसे ही इंसान के अच्छे या बुरे काम उसके आख़िरी ख़रीदार और उसके बदले में मिलने वाले इनाम या सज़ा को तय करते हैं।
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