कुरान - 103:3 सूरह अल-असर अनुवाद, लिप्यंतरण और तफसीर (तफ्सीर).

3
إِلَّا ٱلَّذِينَ ءَامَنُواْ وَعَمِلُواْ ٱلصَّـٰلِحَٰتِ وَتَوَاصَوۡاْ بِٱلۡحَقِّ وَتَوَاصَوۡاْ بِٱلصَّبۡرِ

Transliteration: (Illal lazeena aamanoo wa 'amilus saalihaati wa tawaasaw bilhaqqi wa tawaasaw bissabr)

3.सिवाय उन लोगों के जो ईमान लाए [3] और अच्छे काम किए [4], और एक-दूसरे को सच्चाई की सलाह दी [5], और एक-दूसरे को सब्र की सलाह दी। (अनुवाद — मुफ़्ती अहमद यार ख़ान)

मुफ़्ती अहमद यार ख़ान — सूरह अल-असर आयत 3 तफ़सीर



  • मुफ़्ती अहमद यार ख़ान (तफ़सीर-ए-नईमी)

3. विश्वास और अच्छे कर्मों में लाभ (The Gain in Belief and Faith)
सूरह अल-अस्र की यह आयत विश्वास, अच्छे कर्म, और आपस में एक-दूसरे को सत्य और सब्र की सलाह देने की अहमियत को दर्शाती है। आयत में कहा गया है:

"सिवाय उन लोगों के जो ईमान लाए [3] और अच्छे कर्म किए [4], और एक-दूसरे को सत्य की सलाह दी [5], और एक-दूसरे को सब्र की सलाह दी।"

यह आयत यह स्पष्ट करती है कि इस दुनिया और आख़िरत में सफल होने के लिए यह चार बातें ज़रूरी हैं:

ईमान और अच्छे कर्म (Faith and Righteous Deeds):
ईमान (विश्वास) एक विश्वास रखने वाले की सफलता की नींव है। बिना ईमान के कोई भी कर्म अल्लाह के नज़दीक स्वीकार्य नहीं होते। दिल, जो शरीर का राजा है, को सही विश्वास रखना चाहिए। अगर दिल में गलत विश्वास हो, तो किए गए कर्म भी खराब होंगे। असल सफलता विश्वास और अच्छे कर्मों के संयोजन में है।

  • ईमान पहले आता है, फिर कर्म: पहले अपने विश्वास को सही तरीके से स्थापित करें, क्योंकि तभी आपके कर्म का मूल्य होगा।
  • अच्छे कर्मों की भूमिका: अच्छे कर्म मजबूत विश्वास से उत्पन्न होते हैं, जैसे एक स्वस्थ पेड़ से फल निकलते हैं।

एक-दूसरे को सत्य की सलाह देना (Exhorting One Another to Truth):
आयत में यह कहा गया है कि विश्वास रखने वाले एक-दूसरे को सत्य की सलाह दें। सत्य की यह सलाह देना यह सुनिश्चित करने के लिए आवश्यक है कि हम और हमारे आस-पास के लोग सही रास्ते पर चलें। सच्चे विश्वास रखने वाले यह समझते हैं कि केवल अच्छे कर्म करना ही नहीं, बल्कि दूसरों को भी सही रास्ते पर चलने के लिए प्रेरित करना जरूरी है।

  • प्रचारक बनना: हर विश्वास रखने वाले का कर्तव्य है कि वह सत्य का प्रचार करे और दूसरों को अच्छे कर्मों की ओर मार्गदर्शन करे, चाहे वह एक इस्लामी विद्वान हो या सामान्य व्यक्ति।
  • निरंतर प्रचार: विश्वास का प्रचार केवल कुछ विशेष अवसरों या घटनाओं तक सीमित नहीं होना चाहिए, बल्कि यह हर विश्वास रखने वाले के जीवन का एक हिस्सा होना चाहिए।

एक-दूसरे को सब्र की सलाह देना (Exhorting One Another to Patience):
सब्र विश्वास और अच्छे कर्मों को बनाए रखने के लिए महत्वपूर्ण है, खासकर जब मुसीबतों या चुनौतियों का सामना करना पड़े। आयत में यह भी बताया गया है कि विश्वास रखने वालों को एक-दूसरे को सब्र की सलाह देनी चाहिए।

सब्र के प्रकार (Types of Patience):

मुसीबतों में सब्र: मुश्किलों का सामना करते हुए विश्वास और अच्छे कर्मों को बनाए रखना।

इबादत में सब्र: इबादत में समर्पण बनाए रखना, भले ही थकावट हो या ध्यान में कमी हो।

खुशियों में सब्र: अधिकता या आराम के समय में भी संयम बनाए रखना, ताकि हमारी ईमानदारी और विश्वास कमजोर न हो।

मुसीबतों में धैर्य बनाए रखना: जैसे एक सवार घोड़े को नियंत्रित करता है, वैसे ही एक विश्वास रखने वाले को अपनी इच्छाओं और कर्मों को नियंत्रित करना चाहिए, ताकि वह अल्लाह द्वारा निर्धारित सीमाओं के भीतर रहे।

ईमान और अच्छे कर्मों का शाश्वत लाभ (The Eternal Profit of Faith and Deeds):
सूफी संतों और इस्लामी विद्वानों द्वारा किए गए विश्लेषण से यह स्पष्ट होता है कि अच्छे कर्मों का समय के साथ बढ़ता हुआ लाभ है। जो व्यक्ति अपनी ज़िंदगी की पूंजी (यानि समय) का सही उपयोग नहीं करता, वह एक ऐसे बर्तन की तरह है जिसमें छेद होते हैं, जिससे धीरे-धीरे सारी चीजें बाहर निकल जाती हैं। इसके विपरीत, विश्वास रखने वाले के अच्छे कर्म एक खजाने में बूँद-बूँद की तरह जमा होते हैं, जो अंततः शाश्वत जीवन और पुरस्कार की ओर ले जाते हैं।

शहीदों का इनाम: वे शहीद, जिन्होंने विश्वास के लिए सब कुछ क़ुर्बान कर दिया, एक ऐसा लाभ प्राप्त करते हैं जो सांसारिक नुकसान से ऊपर है। वे शाश्वत जीवन और अल्लाह के पास निकटता प्राप्त करते हैं। जैसा कि आयत में कहा गया है: "बल्कि वे जीवित हैं, हाँ आप नहीं जानते" (सूरह 2: आयत 154)।

इबादत का महत्व: जीवन का उद्देश्य अल्लाह की इबादत करना है। बिना इबादत के, व्यक्ति का जीवन खाली और मूल्यहीन हो जाता है।

आयतों से विशेष दृष्टिकोण (Special Insights from the Verses):

  • ईमान पहले आता है, फिर कर्म: ईमान कर्मों पर पहले आता है, क्योंकि बिना ईमान के कोई भी कर्म स्वीकार्य नहीं होता।
  • कर्मों में सतर्कता: विश्वास रखने वाले को अपने कर्मों के प्रति सतर्क रहना चाहिए, ताकि वे विश्वास और अच्छे कर्मों के अनुसार हों।
  • कर्मों के प्रकार: हर कर्म एक तीन श्रेणियों में आता है—वैध, पुरस्कार देने योग्य, और पापी। विश्वास रखने वालों को वैध और पुरस्कार देने योग्य कर्मों पर ध्यान केंद्रित करना चाहिए, और पापी कर्मों से बचना चाहिए।
  • अच्छे कर्मों में निरंतरता: जैसे एक किसान अपने खेत को मौसम के दौरान संभालता है, वैसे ही एक विश्वास रखने वाला व्यक्ति अच्छे कर्मों में निरंतरता बनाए रखे, ताकि वह मृत्यु तक अच्छे कर्म करता रहे।
  • ईमान और अच्छे कर्मों की सलाह देना: जैसे हज़रत इब्राहीम (अलैहिस्सलाम) ने अपने बच्चों को सत्य और अच्छे कर्मों की सलाह दी, वैसे ही विश्वास रखने वालों को एक-दूसरे को प्रेरित करना चाहिए।
  • इबादत और जीवन में धैर्य: इबादत और जीवन की कठिनाइयों में धैर्य बनाए रखना महत्वपूर्ण है।

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