कुरान - 90:17 सूरह अल-बलद अनुवाद, लिप्यंतरण और तफसीर (तफ्सीर).

17
ثُمَّ كَانَ مِنَ ٱلَّذِينَ ءَامَنُواْ وَتَوَاصَوۡاْ بِٱلصَّبۡرِ وَتَوَاصَوۡاْ بِٱلۡمَرۡحَمَةِ

Transliteration: (Summa kaana minal lazeena aamanoo wa tawaasaw bissabri wa tawaasaw bilmarhamah )

17. फिर वह ऐसा होना चाहिए जो ईमान लाए [17] और एक-दूसरे को सब्र की सलाह दे [18] और एक-दूसरे को रहम की सलाह दे [19]। (अनुवाद — मुफ़्ती अहमद यार ख़ान)

मुफ़्ती अहमद यार ख़ान — सूरह अल-बलद आयत 17 तफ़सीर



  • मुफ़्ती अहमद यार ख़ान (तफ़सीर-ए-नईमी)

17. विश्वास में दृढ़ता और एकता (Steadfastness and Unity in Faith)

यह आयत विश्वास में दृढ़ता बनाए रखने और मुस्लिम समुदाय की एकता को बहुत महत्व देती है।

मुख्य बिंदु (Key Points)

1. विश्वास पहले, अच्छे कर्म बाद में (Belief Precedes Good Deeds)

  • यह आयत इस बात पर जोर देती है कि किसी व्यक्ति को पहले विश्वास होना चाहिए, क्योंकि विश्वास अच्छे कर्मों का आधार है।
  • अच्छे कर्म विश्वास के बिना व्यर्थ होते हैं। एक मुस्लिम के अच्छे कर्म तभी माने जाएंगे जब वे सच्चे विश्वास से प्रेरित हों।
  • यह सिद्धांत बताता है कि बिना विश्वास के कोई भी कार्य न तो स्वीकार्य होता है और न ही उसका महत्व होता है।

2. इस्लाम में विश्वास की भूमिका (The Role of Faith in Islam)

  • अगर कोई गैर-मुस्लिम अच्छे कर्म करता है, तो उन कर्मों का असली महत्व तब ही आता है जब वह इस्लाम को अपनाता है।
  • आयत यह स्पष्ट करती है कि विश्वास किसी भी कार्य की असली क़ीमत और मान्यता को बदल देता है।
  • "चाहिए" शब्द का उपयोग इस बात को बताता है कि पहले विश्वास को स्थापित करना आवश्यक है, ताकि अच्छे कर्म किए जा सकें।

3. विश्वासियों के बीच एकता (Unity Among Believers)

  • विश्वासियों को मुस्लिम समुदाय से दूर नहीं रहना चाहिए। इस आयत में मुस्लिम उम्माह (समुदाय) की एकता की रक्षा करने का संदेश दिया गया है।
  • सामूहिक रूप से इबादत करने से कार्यों की स्वीकृति में वृद्धि होती है, इसलिए विश्वासियों को साथ मिलकर इबादत करने की सलाह दी गई है।

4. आयत से शिक्षा (Lessons from the Verse)

  • एक मुस्लिम को इस्लाम के मार्ग पर दृढ़ रहना चाहिए और विभाजनकारी रास्तों से बचना चाहिए।
  • आत्म-मूल्यांकन से अधिक महत्वपूर्ण यह है कि व्यक्ति अपने को मुस्लिम उम्माह का हिस्सा माने।

18. सब्र के विभिन्न रूप (The Different Forms of Patience)

सब्र (धैर्य) इस्लाम में एक महत्वपूर्ण गुण है, जो एक विश्वासियों के जीवन के कई पहलुओं को प्रभावित करता है। यह आयत धैर्य के विभिन्न प्रकारों और इसके महत्व को उजागर करती है।

मुख्य बिंदु (Key Points)

1. सब्र के प्रकार (Types of Patience)

धार्मिक कर्तव्यों में सब्र (Patience in Religious Duties):
इस प्रकार का सब्र उस समय दिखता है जब कोई व्यक्ति अपनी धार्मिक जिम्मेदारियों को निभाने में कठिनाईयों का सामना करता है।

पापों से बचने में सब्र (Patience Against Sin):
यह सब्र व्यक्ति के खुदा से जुड़ी इच्छाओं और पापों को त्यागने से संबंधित है।

विपत्ति के दौरान सब्र (Patience During Adversity):
यह उस समय की बात करता है जब कोई व्यक्ति कठिन परिस्थितियों से जूझ रहा हो और शांति बनाए रखता है।

दान और संकोच में सब्र (Generosity and Austerity):
यह प्रकार दूसरों की मदद करने और अपनी इच्छाओं को नियंत्रित करने की क्षमता को दर्शाता है।

2. सब्र का महत्व (The Virtue of Patience)

  • सब्र इस्लाम में एक महान गुण है, और इसे नमाज़ (सल्लाह) की आदेश से पहले वर्णित किया गया है, जो इसके महत्व को दर्शाता है।
  • Allah का वादा है कि वह सब्र करने वालों के साथ है, जैसा कि आयत में कहा गया है: "अल्लाह उन लोगों के साथ है जो सब्र करते हैं" (सूरा 2:व153)।

3. धैर्य का प्रचार (The Role of Propagation)

  • आयत यह भी प्रोत्साहित करती है कि विश्वासियों को सब्र का प्रचार करना चाहिए, और दूसरों को भी अपनी क्षमता के अनुसार धैर्य बनाए रखने की सलाह देनी चाहिए।
  • इससे यह स्पष्ट होता है कि चुनौतियों से निपटने के लिए एक-दूसरे को मार्गदर्शन देना और ज्ञान साझा करना महत्वपूर्ण है।

19. रहम की अवधारणा (The Concept of Mercy)

यह आयत जीवन के विभिन्न पहलुओं में रहम (mercy) के महत्व को रेखांकित करती है। इसमें दिखाया गया है कि रहम केवल स्वयं तक सीमित नहीं है, बल्कि यह समाज, परिवार, और यहां तक कि शत्रुओं के लिए भी दिखाना चाहिए।

मुख्य बिंदु (Key Points)

1. दूसरों के प्रति रहम (Mercy Towards Others)

न्याय और रहम (Justice and Mercy):
किसी के अधिकारों का उल्लंघन करना क्रूरता है, जबकि उनके अधिकारों को देना न्याय है। जो चीज़ अधिक दी जाए या बिना किसी अपेक्षा के दी जाए, वह रहम का प्रतीक है।

दूसरों के प्रति रहम (Mercy to Others):
रहम का मतलब दूसरों की मदद करना है, चाहे उन्हें हानि से बचाना हो, उन्हें माफ़ करना हो, या उन्हें बुराई से बचने की सलाह देना हो।

2. स्वयं के प्रति रहम (Mercy to Oneself)

  • स्वयं के प्रति रहम का मतलब यह है कि किसी व्यक्ति को नरक की आग से बचाने के लिए अच्छे कर्म करने और मुक्ति की खोज करना।

3. परिवार और मित्रों के प्रति रहम (Mercy to Family and Friends)

  • परिवार और दोस्तों के प्रति रहम का मतलब है उन्हें इस दुनिया और आखिरत में सफल जीवन जीने के लिए सही मार्गदर्शन देना।

4. दुश्मनों के प्रति रहम (Mercy to Enemies)

  • यहां तक कि व्यक्तिगत या राष्ट्रीय दुश्मनों के प्रति भी रहम दिखाना आवश्यक है, इसका मतलब है कि समाज को उनके बुरे प्रभाव से बचाना और शांति की दिशा में काम करना।

5. रहम का विस्तार (The Scope of Mercy)

  • रहम एक बहुत ही विशाल और महान गुण है, जो जीवन के कई पहलुओं में फैला हुआ है, जैसे व्यक्तिगत दया, समाज में अन्याय को समाप्त करना, और इंसानियत की मदद करना।

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