कुरान - 2:137 सूरह अल-बक़रा अनुवाद, लिप्यंतरण और तफसीर (तफ्सीर).

137
فَإِنۡ ءَامَنُواْ بِمِثۡلِ مَآ ءَامَنتُم بِهِۦ فَقَدِ ٱهۡتَدَواْۖ وَّإِن تَوَلَّوۡاْ فَإِنَّمَا هُمۡ فِي شِقَاقٖۖ فَسَيَكۡفِيكَهُمُ ٱللَّهُۚ وَهُوَ ٱلسَّمِيعُ ٱلۡعَلِيمُ

Transliteration: (Fa in aamanoo bimisli maaa aamantum bihee faqadih tadaw wa in tawallaw fa innamaa hum fee shiqaaq; fasayakfeekahumul laah; wa Huwas Samee'ul Aleem)

"तो अगर वो उसी तरह ईमान लाएं जैसे तुम ईमान लाए हो [275], तो यक़ीनन उन्होंने हिदायत पाई। और अगर वो मुँह मोड़ लें, तो वो बस झगड़े में हैं, और (ऐ महबूब) अल्लाह तुम्हारे लिए उनके मुक़ाबले में काफ़ी है [276]। बेशक अल्लाह बहुत सुनने वाला, बहुत जानने वाला है [277]।" (अनुवाद — मुफ़्ती अहमद यार ख़ान)

मुफ़्ती अहमद यार ख़ान — सूरह अल-बक़रा आयत 137 तफ़सीर



  • मुफ़्ती अहमद यार ख़ान (तफ़सीर-ए-नईमी)

[275] "तो अगर वो उसी तरह ईमान लाएं जैसे तुम ईमान लाए हो..."

  • इस हिस्से में बताया गया कि असल हिदायत उसी को मिलती है जो सहाबा (रज़ि.अ.) के जैसे ईमान लाए।
  • सहाबा का ईमान खालिस, मुकम्मल और अल्लाह व उसके रसूल पर पूरा भरोसा रखने वाला था।
  • जो लोग उसी अक़ीदे और यक़ीन को अपनाते हैं, वो ही सही रास्ते पर हैं।

📌 सबक़: जो सहाबा के ईमान से हट जाए, उसका रास्ता हिदायत का नहीं, गुमराही (भटकाव) का है।

[276] "और (ऐ महबूब) अल्लाह तुम्हारे लिए उनके मुक़ाबले में काफ़ी है..."

  • यहाँ अल्लाह अपने रसूल ﷺ को तसल्ली दे रहे हैं कि अगर दुश्मन पीछे हटें या इंकार करें, तो घबराने की ज़रूरत नहीं।
  • अल्लाह ख़ुद काफ़ी हैं उनकी मदद के लिए — यह तसल्ली हर सच्चे मोमिन के लिए भी है।

📖 इतिहासिक वाक़िआ:
जब हज़रत उस्मान बिन अффान (रज़ि.अ.) को मिस्र से आए बाग़ियों ने शहीद किया,

  • वो क़ुरआन की तिलावत कर रहे थे,
  • और इसी आयत पर थे: "अल्लाह तुम्हारे लिए उनके मुक़ाबले में काफ़ी है"
  • उन्हीं की उंगलियों पर तलवार लगी, और ख़ून इसी आयत पर गिरा।
  • उन्होंने कहा: "ये वही हाथ है जिसने सबसे पहले क़ुरआन लिखा था।"

📜 उस खून से दाग़दार मुसहफ़ (क़ुरआन की कॉपी) सालों तक महफ़ूज़ रहा — एक ज़िंदा निशानी इस आयत की सच्चाई की।

[277] "बेशक अल्लाह बहुत सुनने वाला, बहुत जानने वाला है।"

  • इसका मतलब है कि अल्लाह को तुम्हारे हालात भी मालूम हैं और दुश्मनों की बातें भी सुन रहा है।
  • चाहे मुसलमान थोड़े हों और दुश्मन ज़्यादा, फैसला आख़िर में अल्लाह का होता है।

📌 यह हिस्से में फतह (जीत) की पेशगोई (Prophecy) भी है —
कि भले मुसलमान कमज़ोर और थोड़े हों, लेकिन सच्चे ईमान के साथ अल्लाह की मदद से बड़ी ताक़तों पर भी ग़ालिब आ सकते हैं।

📖 जैसा कि अल्लाह ने दूसरे मुक़ाम पर फ़रमाया:
"और तुम ही ग़ालिब आओगे — अगर तुम मोमिन हो।" (सूरह 3, आयत 139)

🌟 इस आयत से मिलने वाले अहम सबक़:

1. असल हिदायत सहाबा की राह पर है:
उनके ईमान जैसा ईमान अपनाना ज़रूरी है।
जो उनसे हटे, वो गुमराही में है।

2. अल्लाह ही सबसे बड़ी ताक़त है:
दुश्मन कितने भी हों, अल्लाह की मदद काफ़ी है।

3. सब कुछ अल्लाह जानता और सुनता है:
वो हमारी भी सुनता है, और दुश्मनों की चालें भी जानता है — इसलिए यक़ीन रखो।

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