Transliteration: (Yakaadul barqu yakhtafu absaarahum kullamaaa adaaa'a lahum mashaw feehi wa izaaa azlama 'alaihim qaamoo; wa law shaaa'al laahu lazahaba bisam'ihim wa absaarihim; innal laaha 'alaa kulli shai'in Qadeer (section 2))
मुनाफ़िक़ हमेशा रूहानी तौर पर अंधे और बहरे रहते हैं,
ये उनके बुरे आमाल (कामों) की वजह से है।
👉 फिर भी अल्लाह ने उनकी सारी इंद्रियाँ बिल्कुल नहीं छीनी —
क्योंकि दुनिया का निज़ाम अल्लाह की मर्ज़ी से चलता है,
ना कि अपने आप।
👉 जब भी हक़ की रौशनी (चमक) दिखाई देती है — जैसे कोई फायदा या आसानी — तो वो आगे बढ़ते हैं।
लेकिन जब मुसीबत या क़ुर्बानी की बात आती है,
तो वो वहीं खड़े रह जाते हैं,
कंफ़्यूज़ (भ्रमित) होकर,
चलने की हिम्मत नहीं होती।
👉 उनका हिदायत की तरफ़ चलना सिर्फ मौक़ापरस्ती होता है —
सच्चा यक़ीन नहीं।
आख़िर में जो जुम्ला है:
"बेशक अल्लाह हर चीज़ पर क़ादिर है",
इसका मतलब यह है कि —
जो कुछ भी अल्लाह की मर्ज़ी और हिकमत में हो सकता है,
वो सब करने की पूरी ताक़त अल्लाह के पास है।
👉 इसका मतलब बिलकुल नहीं कि अल्लाह कोई झूठ या गलती कर सकता है —
ऐसी बातें अल्लाह की शान के ख़िलाफ़ हैं।
👉 इस आयत से उन गलत सोचों की सख़्त तरदीद (इन्कार) होती है,
जैसे ये कहना कि अल्लाह झूठ बोल सकता है (माअाज़ अल्लाह)।
ये गहरी अक़ीदे की गलती है।
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