Transliteration: (Aw kasaiyibim minas samaaa'i feehi zulumaatunw wa ra'dunw wa barq, yaj'aloona asaabi'ahum feee aazaanihim minas sawaa'iqi hazaral mawt' wallaahu muheetum bilkaafireen)
इस आयत में मुनाफ़िक़ों की हालत एक तूफ़ानी रात में भटके हुए लोगों जैसी बताई गई है —
👉 सहाबा (रज़ि.) के लिए यह सब बरकत (रहमत) थी,
लेकिन मुनाफ़िक़ों के लिए यही चीजें डर और सज़ा बन गईं।
क़ुरआन एक रूहानी बारिश की तरह है —
जिसमें हक़ की दलीलें बिजली की तरह चमकती हैं,
और अल्लाह के अज़ाब की धमकी गरज जैसी गूंजती है।
👉 जैसे कोई मुसाफ़िर जंगल में तूफ़ान से डरकर अपने कान बंद कर ले —
वैसे ही मुनाफ़िक़ हक़ की आवाज़ से डरकर भागते हैं।
👉 थोड़ी सी रौशनी (हक़) उन्हें इस्लाम की तरफ़ खींचती है,
मगर जैसे ही मुश्किल आती है, वो फिर कुफ्र की तरफ़ पलट जाते हैं।
👉 इनका सफर ईमान से नहीं, बल्कि डर और खुदगर्जी से चलता है —
हक़ और बातिल के बीच झूलते रहते हैं, बग़ैर किसी सच्चे यक़ीन के।
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