कुरान - 2:19 सूरह अल-बक़रा अनुवाद, लिप्यंतरण और तफसीर (तफ्सीर).

19
أَوۡ كَصَيِّبٖ مِّنَ ٱلسَّمَآءِ فِيهِ ظُلُمَٰتٞ وَرَعۡدٞ وَبَرۡقٞ يَجۡعَلُونَ أَصَٰبِعَهُمۡ فِيٓ ءَاذَانِهِم مِّنَ ٱلصَّوَٰعِقِ حَذَرَ ٱلۡمَوۡتِۚ وَٱللَّهُ مُحِيطُۢ بِٱلۡكَٰفِرِينَ

Transliteration: (Aw kasaiyibim minas samaaa'i feehi zulumaatunw wa ra'dunw wa barq, yaj'aloona asaabi'ahum feee aazaanihim minas sawaa'iqi hazaral mawt' wallaahu muheetum bilkaafireen)

19. या उनकी मिसाल एक तेज़ बारिश जैसी है जो आसमान से हो रही हो, जिसमें अंधेरा [35], गरज और बिजली हो। वे अपनी उंगलियाँ अपने कानों में डाल लेते हैं गरज की आवाज़ से, मौत के डर से। और अल्लाह काफ़िरों को घेरे हुए है [36]। (अनुवाद — मुफ़्ती अहमद यार ख़ान)

मुफ़्ती अहमद यार ख़ान — सूरह अल-बक़रा आयत 19 तफ़सीर



  • मुफ़्ती अहमद यार ख़ान (तफ़सीर-ए-नईमी)

[35] आसमान से मुराद है नबूवत, और बारिश से मुराद है क़ुरआन

इस आयत में मुनाफ़िक़ों की हालत एक तूफ़ानी रात में भटके हुए लोगों जैसी बताई गई है —

  • आसमान से मुराद है नबूवत का आसमान,
  • बादल हैं क़ुरआन,
  • बारिश है अल्लाह का कानून,
  • गरज है अज़ाब वाली आयतें,
  • और बिजली है मनाही और रोक टोक वाली बातें।

👉 सहाबा (रज़ि.) के लिए यह सब बरकत (रहमत) थी,
लेकिन मुनाफ़िक़ों के लिए यही चीजें डर और सज़ा बन गईं।

[36] तूफ़ान उनकी भीतरी हालत को दिखाता है

क़ुरआन एक रूहानी बारिश की तरह है —
जिसमें हक़ की दलीलें बिजली की तरह चमकती हैं,
और अल्लाह के अज़ाब की धमकी गरज जैसी गूंजती है।

👉 जैसे कोई मुसाफ़िर जंगल में तूफ़ान से डरकर अपने कान बंद कर ले —
वैसे ही मुनाफ़िक़ हक़ की आवाज़ से डरकर भागते हैं।

👉 थोड़ी सी रौशनी (हक़) उन्हें इस्लाम की तरफ़ खींचती है,
मगर जैसे ही मुश्किल आती है, वो फिर कुफ्र की तरफ़ पलट जाते हैं।

👉 इनका सफर ईमान से नहीं, बल्कि डर और खुदगर्जी से चलता है —
हक़ और बातिल के बीच झूलते रहते हैं, बग़ैर किसी सच्चे यक़ीन के।

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