Transliteration: (Wa laqad aatainaa Moosal Kitaaba wa qaffainaa mim ba'dihee bir Rusuli wa aatainaa 'Eesab-na-Maryamal baiyinaati wa ayyadnaahu bi Roohil Qudus; afakullamaa jaaa'akum Rasoolum bimaa laa tahwaaa anfusukumus takbartum fafareeqan kazzabtum wa fareeqan taqtuloon)
हज़रत मूसा (अलैहि सलाम) के बाद अल्लाह ने चार हज़ार से ज़्यादा नबी भेजे, जिन्होंने उनकी किताब और शरीअत को आगे पहुँचाया। हमारे प्यारे नबी ﷺ अंतिम रसूल हैं, इसलिए अब क़ुरआन और शरीअत की हिफ़ाज़त की ज़िम्मेदारी उम्मत के उलमा पर है। नबी ﷺ ने फ़रमाया: "मेरी उम्मत के उलमा बनी इसराईल के नबियों की तरह हैं।"
रूहुल कुदुस से मुराद जिबरील (अलैहि सलाम) हैं जो अल्लाह के पाक फ़रिश्ते हैं और ईसा (अलैहि सलाम) की हर वक़्त मदद करते रहे। इससे यह बात भी साबित होती है कि अल्लाह के हुक्म से रसूल या फरिश्ते मदद कर सकते हैं — यह शिर्क नहीं है।
इसराईली नबीों के पास तब तक मानते थे जब तक वो उनके मन के मुताबिक बात करते। लेकिन जब कोई रसूल उन्हें ऐसी बात बताता जो उनकी नफ्स को पसंद न हो, तो वो घमंड करने लगते थे। यह आयत सिखाती है कि सच्चा ईमान तब साबित होता है जब इंसान अल्लाह के हुक्म को अपनी पसंद पर तरजीह दे।
कुछ नबियों को इनकार करने वालों ने मार डाला, जैसे हज़रत ज़करिया और हज़रत याह्या (अलैहिमस्सलाम)। लेकिन यह उस मदद से टकराव नहीं करता जो अल्लाह ने जिहाद में वादा की है, क्योंकि जिन रसूलों को क़त्ल किया गया उन पर जिहाद फ़र्ज़ नहीं था।
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