Transliteration: (Allazeena ja'alul Quraana'ideen)
जिन्होंने क़ुरआन के टुकड़े-टुकड़े कर दिए [103]।
इससे मुराद पहले अहले-किताब (यहूदी व ईसाई) हैं जिन्होंने अपनी किताबों में रद्दोबदल किया — जो हिस्सा उनके मुवाफ़िक़ था उसे माना और बाक़ी को झुठला दिया या छिपा दिया। इसी तरह मक्का के मुशरिक़ीन भी क़ुरआन-ए-पाक के मुख़्तलिफ़ टुकड़े करते थे: कोई इसे जादू कहता, कोई शायरी, और कोई पुरानी कहानियाँ। यह आयत दीन के अहकाम में अपनी पसन्द के मुताबिक़ कुछ को मानने और कुछ को ठुकराने की सख़्त मज़म्मत करती है।
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