कुरान - 4:130 सूरह अन-निसा अनुवाद, लिप्यंतरण और तफसीर (तफ्सीर).

130
وَإِن يَتَفَرَّقَا يُغۡنِ ٱللَّهُ كُلّٗا مِّن سَعَتِهِۦۚ وَكَانَ ٱللَّهُ وَٰسِعًا حَكِيمٗا

Transliteration: (Wa iny-yatafarraqaa yughnil laahu kullam min sa'atih; wa kaanal laahu Waasi'an Hakeemaa)

अगर दोनों जुदा हो जाएँ (तलाक़ के ज़रिए), तो अल्लाह अपने फ़ज़्ल से दोनों को एक-दूसरे से मुक्त कर देगा [393], और अल्लाह बहुत ही फ़ज़्ल करने वाला, हिकमत वाला है [394]। (अनुवाद — मुफ़्ती अहमद यार ख़ान)

मुफ़्ती अहमद यार ख़ान — सूरह अन-निसा आयत 130 तफ़सीर



  • मुफ़्ती अहमद यार ख़ान (तफ़सीर-ए-नईमी)

📖 सूरा अन-निसा – आयत 130 की तफ़्सीर

 

✅ [393] जुदाई के बाद अल्लाह पर भरोसा

अगर पति-पत्नी के बीच सुलह मुमकिन न हो और तलाक़ हो जाए, तो दोनों को अल्लाह पर भरोसा करना चाहिए। अल्लाह उन्हें अपने फ़ज़्ल से नई ज़िंदगी देगा — मुमकिन है कोई बेहतर जीवनसाथी, या रिज़्क़ व आराम का ज़रिया। यानी जुदाई अंत नहीं, बल्कि बरकतों की नई शुरुआत हो सकती है अगर इंसान अल्लाह पर तवक्कुल करे।

✅ [394] निकाह से परे भी रब का इनआम

यह आयत बताती है कि कभी-कभी तलाक़ से दोनों को भावनात्मक या आर्थिक बोझ से राहत मिल सकती है। इसमें यह भी साफ़ है कि निकाह ही एकमात्र सहारा नहीं — न औरत पूरी तरह शौहर पर निर्भर है, न मर्द बीवी का मोहताज। असल सहारा अल्लाह है, वही रिज़्क़ देने वाला और हर हाल में मददगार है।

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