Transliteration: (Wa iny-yatafarraqaa yughnil laahu kullam min sa'atih; wa kaanal laahu Waasi'an Hakeemaa)
अगर पति-पत्नी के बीच सुलह मुमकिन न हो और तलाक़ हो जाए, तो दोनों को अल्लाह पर भरोसा करना चाहिए। अल्लाह उन्हें अपने फ़ज़्ल से नई ज़िंदगी देगा — मुमकिन है कोई बेहतर जीवनसाथी, या रिज़्क़ व आराम का ज़रिया। यानी जुदाई अंत नहीं, बल्कि बरकतों की नई शुरुआत हो सकती है अगर इंसान अल्लाह पर तवक्कुल करे।
यह आयत बताती है कि कभी-कभी तलाक़ से दोनों को भावनात्मक या आर्थिक बोझ से राहत मिल सकती है। इसमें यह भी साफ़ है कि निकाह ही एकमात्र सहारा नहीं — न औरत पूरी तरह शौहर पर निर्भर है, न मर्द बीवी का मोहताज। असल सहारा अल्लाह है, वही रिज़्क़ देने वाला और हर हाल में मददगार है।
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