कुरान - 4:54 सूरह अन-निसा अनुवाद, लिप्यंतरण और तफसीर (तफ्सीर).

54
أَمۡ يَحۡسُدُونَ ٱلنَّاسَ عَلَىٰ مَآ ءَاتَىٰهُمُ ٱللَّهُ مِن فَضۡلِهِۦۖ فَقَدۡ ءَاتَيۡنَآ ءَالَ إِبۡرَٰهِيمَ ٱلۡكِتَٰبَ وَٱلۡحِكۡمَةَ وَءَاتَيۡنَٰهُم مُّلۡكًا عَظِيمٗا

Transliteration: (Am yahsudoonan naasa 'alaa maaa aataahumul laahu min fadlihee faqad aatainaaa Aala Ibraaheemal Kitaaba wal Hikmata wa aatainaahum mulkan 'azeemaa)

क्या वे लोगों से इस बात पर जलते हैं कि अल्लाह ने उन्हें अपने फ़ज़्ल से क्या कुछ दे दिया? [189] तो हमने तो इब्राहीम के घराने को किताब और हिकमत अता की थी [190] और उन्हें एक बड़ी सल्तनत दी थी [191]। (अनुवाद — मुफ़्ती अहमद यार ख़ान)

मुफ़्ती अहमद यार ख़ान — सूरह अन-निसा आयत 54 तफ़सीर



  • मुफ़्ती अहमद यार ख़ान (तफ़सीर-ए-नईमी)

📖 सूरा अन-निसा – आयत 54 की तफ़्सीर

 

✅ [189] नबी ﷺ और मुसलमानों से यहूदियों की जलन

यह आयत यहूदियों की उस हसद (जलन) की ओर इशारा करती है जो वे नबी करीम मुहम्मद ﷺ और उनके साथियों से रखते थे। वे अल्लाह द्वारा उन्हें दी गई इज़्ज़त, रहनुमाई और रहमतों को देखकर कुढ़ते थे। सच्चाई को मानने के बजाय, वे इस बात से परेशान थे कि आख़िरी रसूल एक अरब में से क्यों आया, बनी इस्राईल में से क्यों नहीं।

✅ [190] अल्लाह की नेअमतें – किसी की मिरास नहीं

इसमें यह समझाया गया कि पैग़म्बरी, ईमान और तक़्वा अल्लाह की ख़ास नेअमतें हैं, जो वह जिसे चाहे अता करता है। न कोई नसब (वंश) का हक़दार है, न कोई अपने फ़ज़ीलत या कोशिश की बिना पर दावा कर सकता है। यह सब कुछ अल्लाह के करम से होता है।

✅ [191] इब्राहीम (अ.स.) के घराने को किताब और हिकमत

इससे ये बातें निकलती हैं:

  • पैग़म्बरी और इल्मे-दीनी अल्लाह की बहुत बड़ी नेमतें हैं, जिन्हें उन्होंने इब्राहीम (अ.स.) और उनके अहले-बैत को अता किया।
  • पैग़म्बरी इब्राहीम की नस्ल तक महदूद रही। उनके अलावा किसी को यह दर्जा नहीं मिला।
    इसलिए मिर्ज़ा ग़ुलाम अहमद क़ादियानी नबी नहीं हो सकता, क्योंकि वह नबी ﷺ की नस्ल से नहीं है।
  • पाक नसब खुद एक बड़ाई है। जैसे कि ख़िलाफ़त नबी ﷺ के बाद क़ुरैश में रही।
  • सवािइक़ मुहर्रिक़ा में लिखा है कि बड़े रूहानी मक़ामात वाले लोग नबी ﷺ की नस्ल से होंगे, जिनमें इमाम महदी (अ.स.) भी शामिल हैं।

✅ [192] सल्तनत – एक दुनियावी इनआम

यहां जिस "बड़ी सल्तनत" का ज़िक्र है, उससे मुराद दुनिया की हुकूमत है, जो अल्लाह ने कुछ पैग़म्बरों को दी, जैसे:

  • हज़रत यूसुफ़ (अ.स.)
  • हज़रत दाऊद (अ.स.)

इन दोनों को पैग़म्बरी और बादशाहत दोनों मिलीं। फिर अगर अल्लाह ने अपने महबूब नबी मुहम्मद ﷺ को भी पैग़म्बरी के साथ असर व नफ़ूज़ दिया है, तो इस पर कुफ़्फ़ार को क्यों तकलीफ़ होती है? उनकी नफ़रत उनकी तकब्बुर को दिखाती है, जबकि अल्लाह का फ़ैसला हिकमत और इन्साफ़ पर है।

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