Transliteration: (Innal lazeena kafaroo bi Aayaatinaa sawfa nusleehim Naaran kullamaa nadijat julooduhum baddalnaahum juloodan ghairahaa liyazooqul 'azaab; innallaaha kaana 'Azeezan Hakeemaa)
इससे हमें यह समझ आता है कि रसूल ﷺ का इनकार करना क़ुरआन की सभी आयतों का इनकार करने के बराबर है, और इस इनकार का अंजाम जहन्नम की आग है।
इससे दो अहम बातें निकलती हैं:
हालाँकि जहन्नम की आग काफ़िरों के पूरे जिस्म को घेरेगी, लेकिन सिर्फ उनकी खालें बार-बार जलाई जाएंगी। अल्लाह तआला फ़रमाता है: "वह आग जो दिलों तक पहुँचेगी" (सूरा हमज़ा, 104:7)।
इतनी शिद्दत वाली आग में भी उन्हें मौत नहीं आएगी। हर बार जब उनकी खाल जल जाएगी, नई खाल उगा दी जाएगी, जैसे फोड़े या छाले के बाद नई खाल बनती है।
यह सज़ा सिर्फ काफ़िरों के लिए ख़ास है; मुसलमानों की सज़ा इसकी तरह न होगी।
इसका मतलब है कि अल्लाह तआला हर तरह की सज़ा देने पर पूरी क़ुदरत रखता है, और हर सज़ा में उसकी हिकमत भी शामिल होती है।
यह अल्लाह की क़ुदरत का करिश्मा है कि इतने सख़्त और हमेशा के अजाब के बावजूद काफ़िरों को मौत नहीं आएगी।
एक आसान मिसाल: लोहे और इस्पात को ज़मीन में डालो तो वह गल जाता है, लेकिन बीज डालो तो वह उगता है। यही है अल्लाह की कामिल क़ुदरत और हिकमत।
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