कुरान - 4:58 सूरह अन-निसा अनुवाद, लिप्यंतरण और तफसीर (तफ्सीर).

58
۞إِنَّ ٱللَّهَ يَأۡمُرُكُمۡ أَن تُؤَدُّواْ ٱلۡأَمَٰنَٰتِ إِلَىٰٓ أَهۡلِهَا وَإِذَا حَكَمۡتُم بَيۡنَ ٱلنَّاسِ أَن تَحۡكُمُواْ بِٱلۡعَدۡلِۚ إِنَّ ٱللَّهَ نِعِمَّا يَعِظُكُم بِهِۦٓۗ إِنَّ ٱللَّهَ كَانَ سَمِيعَۢا بَصِيرٗا

Transliteration: (Innal laaha ya'murukum an tu'addul amaanaati ilaaa ahlihaa wa izaa hakamtum bainan naasi an tahkumoo bil'adl; innal laaha ni'immaa ya'izukum bih; innal laaha kaana Samee'am Baseeraa)

निःसंदेह अल्लाह तुम्हें हुक्म देता है कि अमानतें उनके हक़दारों को लौटा दिया करो [201], और जब लोगों के बीच फ़ैसला करो तो इंसाफ़ के साथ फ़ैसला किया करो [202]। निःसंदेह अल्लाह तुम्हें बहुत अच्छी सीख देता है। बेशक, अल्लाह हर बात को सुनने वाला, देखने वाला है [203]। (अनुवाद — मुफ़्ती अहमद यार ख़ान)

मुफ़्ती अहमद यार ख़ान — सूरह अन-निसा आयत 58 तफ़सीर



  • मुफ़्ती अहमद यार ख़ान (तफ़सीर-ए-नईमी)

📖 सूरा अन-निसा – आयत 58 की तफ़्सीर

 

✅ [201] अमानतों को लौटाना — एक अल्लाही हुक्म

अमानत किसी भी ऐसी चीज़ को कहते हैं जिसे किसी पर भरोसे के साथ सौंपा गया हो —
चाहे वह माल, जिम्मेदारी, इल्म, या रूहानी राज़ क्यों न हो।
हर इंसान पर यह फ़र्ज़ है कि जो अमानत उसके पास है, ईमानदारी और सच्चाई से अदा करे।
कुछ उलमा के मुताबिक, यह आयत उस समय नाज़िल हुई जब फ़तेह मक्का के समय
हुज़ूर ﷺ ने हज़रत उस्मान बिन तल्हा (रज़ि.) को काबा की चाबी वापस लौटाने का हुक्म दिया।
हालाँकि कुछ सहाबा इस जिम्मेदारी को लेना चाहते थे, लेकिन अमानत की हक़दारी के उसूल पर चलते हुए
चाबी उन्हीं को लौटाई गई।
हज़रत उस्मान बाद में इस हुस्ने-अख़लाक़ से मुतास्सिर होकर मुसलमान हो गए।
आज भी उनके वंशज काबा की चाबियों के संरक्षक हैं।
हालाँकि यह आयत एक ख़ास मौक़े पर उतरी, लेकिन इसका हुक्म हर किस्म की अमानत पर लागू होता है।

✅ [202] इंसाफ़ के साथ फ़ैसला करना — हाकिम की पाक ज़िम्मेदारी

इस्लामी क़ानून के अनुसार, हाकिम या ज़िम्मेदार अफसर को फ़ैसला करते समय
दोनों पक्षों के साथ बराबरी का सलूक करना ज़रूरी है, इन पाँच बातों में:

  • इजाज़त — दोनों को अपनी बात कहने का बराबर मौक़ा दिया जाए
  • बैठक — दोनों को समान दर्जे की जगह दी जाए
  • तवज्जो — बराबरी की नज़र से देखा जाए
  • सुनवाई — दोनों की बात को संजीदगी से सुना जाए
  • फ़ैसला — बिल्कुल निष्पक्ष और इंसाफ़ के मुताबिक़ किया जाए
    इससे इस्लामी निज़ाम का इंसाफ़ पर आधारित होना ज़ाहिर होता है।

✅ [203] अल्लाह — हर हाकिम का आला गवाह

ऐ हाकिमों और ज़िम्मेदारों! याद रखो:
तुमसे ऊपर भी एक सर्वोच्च सत्ता है — अल्लाह, जो:

  • तुम्हारी बातचीत सुन रहा है
  • तुम्हारे फ़ैसलों को देख रहा है
  • तुम्हारे हर अमल की निगरानी कर रहा है
    और कल क़ियामत के दिन, तुम्हें भी उसकी अदालत में पेश होना है।

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