Transliteration: (Alam tara ilal lazeena yaz'umoona annahum amanoo bimaa unzilaa ilaika wa maaa unzila min qablika yureedoona ai yatahaakamooo ilat Taaghooti wa qad umirooo ai yakfuroo bihi, wa yureedush Shaitaanu ai yudillahum dalaalam ba'eedaa)
यह आयत एक मुनाफ़िक़ बशर के बारे में नाज़िल हुई। उसका एक यहूदी से झगड़ा था।
यहूदी चाहता था कि मामला रसूल ﷺ के पास ले जाया जाए, जबकि बशर चाहता था कि
क़ाब बिन अशरफ़ — जो इस्लाम का दुश्मन था — उसके पास फ़ैसला कराया जाए।
यहूदी ने इंकार कर दिया और मामला रसूल ﷺ के पास ले गया।
रसूल ﷺ ने यहूदी के हक़ में फ़ैसला दिया।
बशर इससे नाखुश होकर हज़रत उमर (रज़ि.) के पास गया।
जब यहूदी ने बताया कि नबी ﷺ पहले ही फ़ैसला दे चुके हैं लेकिन बशर इनकार कर रहा है,
तो हज़रत उमर (रज़ि.) ने उसे वहीं क़त्ल कर दिया और फ़रमाया:
"जो नबी ﷺ के फ़ैसले से राज़ी नहीं, उसका अंजाम यही है।"
इस वाक़िए से कई बातें साफ़ होती हैं:
इस आयत से यह भी समझ आता है कि
काफ़िरों को रहनुमा बनाना या उनकी बातों को खुशी से मानना इस्लाम में बड़ा गुनाह है।
यह सिर्फ़ मजबूरी में माफ़ हो सकता है।
मुसलमानों को हुक्म दिया गया है कि ताग़ूत — चाहे वह झूठे ख़ुदा हों, ज़ालिम हाकिम हों
या ग़लत सोच-विचार — उनका पूरी तरह इनकार करें।
शैतान की चाहत है कि मुसलमान रसूल ﷺ की हुकूमत को छोड़कर भटक जाएं।
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