Transliteration: (Yaaa aiyuhal lazeena aamanooo atee'ul laaha wa atee'ur Rasoola wa ulil amri minkum fa in tanaaza'tum fee shai'in faruddoohu ilal laahi war Rasooli in kuntum tu'minoona billaahi wal yawmil Aakhir; zaalika khairunw wa ahsanu ta'weelaa)
इस आयत में हुक्म है कि ईमान वाले तीन दर्जों की इताअत करें:
"ज़िम्मेदार लोग" से मुराद दोनों हो सकते हैं:
लेकिन दुनियावी हाकिम की इताअत उसी हद तक वैध है, जब तक वह दीन की हदों के अंदर हो।
अगर उनका हुक्म खुदगर्ज़ी या इस्लाम के ख़िलाफ़ हो, तो उसकी इताअत जायज़ नहीं।
रसूल ﷺ की इताअत बिना शर्त है।
उनका हर हुक्म क़तई और फ़ैसला कुन है।
जैसे:
इसी वजह से रसूल ﷺ को "उलुल अम्र" में शामिल नहीं किया गया — उनका मुक़ाम सब से ऊपर है।
यह आयत तक़लीद (मुफ़्तियों की पैरवी) की भी दलील है।
अगर ईमान वाले और उनके हाकिम या रहनुमा के बीच कोई मतभेद हो जाए,
तो इस्लाम के क़तई हुक्मों की तरफ़ रजू करना ज़रूरी है।
रूहुल बयान के मुताबिक, इससे यह बात ज़ाहिर होती है कि
रसूल ﷺ ही हाकिमुल हुक्काम (सबसे ऊँचे शासक) हैं।
जब हम शरीअत के मुफ़्तियों और आलिमों से रहनुमाई लेते हैं,
तो वह रसूल ﷺ की तालीमात ही हमें बताते हैं।
रसूल ﷺ की इताअत दरअसल अल्लाह की इताअत है।
और उलमा की वफ़ादारी, रसूल ﷺ की वफ़ादारी का हिस्सा है।
इसी तरह, एक नेक और शरीअत-पसंद हाकिम की इताअत भी इस सिलसिले में शामिल है।
इस आयत से साफ़ होता है कि
सिर्फ़ ईमान का दावा काफ़ी नहीं, उसे अमल से साबित करना ज़रूरी है।
अगर कोई कहे कि वह अल्लाह और रसूल ﷺ पर ईमान रखता है,
मगर अमली तौर पर गैर-इस्लामी क़ानूनों (जैसे अमेरिका या इंग्लैंड के) को अपनाए,
तो उसका दावा खोखला है।
सच्चा ईमान — शरीअत की पैरवी से ही साबित होता है।
हालाँकि कुछ शरीअती हुक्म बाहरी तौर पर मुश्किल लगते हैं, जैसे:
लेकिन आख़िरकार इन्हीं में भलाई और सफलता है।
जो समाज सूद लेता है, वह तबाह हो जाता है।
और जो ज़कात देता है, उसमें बरकत और तरक़्क़ी आती है।
इसलिए शरीअत के हुक्मों को मानना मुश्किल नहीं, बल्कि कामयाबी की राह है।
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