कुरान - 4:59 सूरह अन-निसा अनुवाद, लिप्यंतरण और तफसीर (तफ्सीर).

59
يَـٰٓأَيُّهَا ٱلَّذِينَ ءَامَنُوٓاْ أَطِيعُواْ ٱللَّهَ وَأَطِيعُواْ ٱلرَّسُولَ وَأُوْلِي ٱلۡأَمۡرِ مِنكُمۡۖ فَإِن تَنَٰزَعۡتُمۡ فِي شَيۡءٖ فَرُدُّوهُ إِلَى ٱللَّهِ وَٱلرَّسُولِ إِن كُنتُمۡ تُؤۡمِنُونَ بِٱللَّهِ وَٱلۡيَوۡمِ ٱلۡأٓخِرِۚ ذَٰلِكَ خَيۡرٞ وَأَحۡسَنُ تَأۡوِيلًا

Transliteration: (Yaaa aiyuhal lazeena aamanooo atee'ul laaha wa atee'ur Rasoola wa ulil amri minkum fa in tanaaza'tum fee shai'in faruddoohu ilal laahi war Rasooli in kuntum tu'minoona billaahi wal yawmil Aakhir; zaalika khairunw wa ahsanu ta'weelaa)

ऐ ईमान वालों! अल्लाह का हुक्म मानो, और रसूल का हुक्म मानो, और तुममें से जिनको हुकूमत दी गई है, उनका भी। और अगर तुममें किसी बात में झगड़ा हो जाए [205], तो उसे अल्लाह और उसके रसूल की तरफ़ लौटाओ [206], अगर तुम अल्लाह और आख़िरत के दिन पर ईमान रखते हो [207]। यही बेहतर है और इसका अंजाम सबसे अच्छा है [208]। (अनुवाद — मुफ़्ती अहमद यार ख़ान)

मुफ़्ती अहमद यार ख़ान — सूरह अन-निसा आयत 59 तफ़सीर



  • मुफ़्ती अहमद यार ख़ान (तफ़सीर-ए-नईमी)

📖 सूरा अन-निसा – आयत 59 की तफ़्सीर

 

✅ [204] हुकूमत और रहनुमाई की इताअत — दीनी और दुनियावी दोनों

इस आयत में हुक्म है कि ईमान वाले तीन दर्जों की इताअत करें:

  • अल्लाह की
  • रसूल ﷺ की
  • अपने में से ज़िम्मेदार लोगों की

"ज़िम्मेदार लोग" से मुराद दोनों हो सकते हैं:

  • दीनी रहनुमा जैसे: उलमा, मुफ़्ती, मुज्तहिद, सूफी बुज़ुर्ग
  • दुनियावी हाकिम जैसे: अमीर, गवर्नर, सुल्तान

लेकिन दुनियावी हाकिम की इताअत उसी हद तक वैध है, जब तक वह दीन की हदों के अंदर हो।
अगर उनका हुक्म खुदगर्ज़ी या इस्लाम के ख़िलाफ़ हो, तो उसकी इताअत जायज़ नहीं।
रसूल ﷺ की इताअत बिना शर्त है।
उनका हर हुक्म क़तई और फ़ैसला कुन है।
जैसे:

  • हज़रत अली (रज़ि.) को फ़ातिमा (रज़ि.) की ज़िंदगी में दूसरी शादी की इजाज़त न देना
  • हज़रत हुज़ैमा (रज़ि.) की एक गवाही को दो के बराबर मानना

इसी वजह से रसूल ﷺ को "उलुल अम्र" में शामिल नहीं किया गया — उनका मुक़ाम सब से ऊपर है।
यह आयत तक़लीद (मुफ़्तियों की पैरवी) की भी दलील है।

✅ [205] मतभेद की सूरत में हुक्म-ए-शरीअत की तरफ़ रजू

अगर ईमान वाले और उनके हाकिम या रहनुमा के बीच कोई मतभेद हो जाए,
तो इस्लाम के क़तई हुक्मों की तरफ़ रजू करना ज़रूरी है।
रूहुल बयान के मुताबिक, इससे यह बात ज़ाहिर होती है कि
रसूल ﷺ ही हाकिमुल हुक्काम (सबसे ऊँचे शासक) हैं।

✅ [206] मुफ़्तियों की रहनुमाई लेना — रसूल ﷺ की तरफ़ रजू है

जब हम शरीअत के मुफ़्तियों और आलिमों से रहनुमाई लेते हैं,
तो वह रसूल ﷺ की तालीमात ही हमें बताते हैं।
रसूल ﷺ की इताअत दरअसल अल्लाह की इताअत है।
और उलमा की वफ़ादारी, रसूल ﷺ की वफ़ादारी का हिस्सा है।
इसी तरह, एक नेक और शरीअत-पसंद हाकिम की इताअत भी इस सिलसिले में शामिल है।

✅ [207] सच्चा ईमान — दावा नहीं, अमल है

इस आयत से साफ़ होता है कि
सिर्फ़ ईमान का दावा काफ़ी नहीं, उसे अमल से साबित करना ज़रूरी है।
अगर कोई कहे कि वह अल्लाह और रसूल ﷺ पर ईमान रखता है,
मगर अमली तौर पर गैर-इस्लामी क़ानूनों (जैसे अमेरिका या इंग्लैंड के) को अपनाए,
तो उसका दावा खोखला है।
सच्चा ईमान — शरीअत की पैरवी से ही साबित होता है।

✅ [208] शरीअत के अंजामात — हमेशा फायदे वाले

हालाँकि कुछ शरीअती हुक्म बाहरी तौर पर मुश्किल लगते हैं, जैसे:

  • ज़कात
  • जिहाद
  • सूद की हरामियत

लेकिन आख़िरकार इन्हीं में भलाई और सफलता है।
जो समाज सूद लेता है, वह तबाह हो जाता है।
और जो ज़कात देता है, उसमें बरकत और तरक़्क़ी आती है।
इसलिए शरीअत के हुक्मों को मानना मुश्किल नहीं, बल्कि कामयाबी की राह है।

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