कुरान - 106:3 सूरह क़ुरैश अनुवाद, लिप्यंतरण और तफसीर (तफ्सीर).

3
فَلۡيَعۡبُدُواْ رَبَّ هَٰذَا ٱلۡبَيۡتِ

Transliteration: (Faly'abudoo rabba haazal-bait)

3.तो उन्हें इस घर (काबा) के रब [3] की इबादत करनी चाहिए। (अनुवाद — मुफ़्ती अहमद यार ख़ान)

मुफ़्ती अहमद यार ख़ान — सूरह क़ुरैश आयत 3 तफ़सीर



  • मुफ़्ती अहमद यार ख़ान (तफ़सीर-ए-नईमी)

अल्लाह की इबादत और सेवा का कर्तव्य
(The Duty of Worship and Service to Allah)

काबा के रब की इबादत का कर्तव्य (Obligation to Worship the Lord of the Ka'bah):
मक्का के कुरैश को इज़्ज़त दी जाती थी क्योंकि वे पवित्र काबा की सेवा करते थे।
इसलिए, उनका कर्तव्य था कि वे काबा के रब (Allah Almighty) की इबादत करें।
यह शिक्षा उन सभी पर लागू होती है जिन्हें अल्लाह धार्मिक सम्मान (religious honour) देता है, जैसे علماء (scholars), धार्मिक मार्गदर्शक (religious guides), और सय्यद (Sayyeds)। उन्हें धर्म की सेवा करनी चाहिए और पैग़ंबर (Prophet) की प्रति वफादार रहना चाहिए, क्योंकि वे उनके नाम से लाभान्वित होते हैं।

सूरह का संदर्भ (Context of the Surah):
यह सूरह मक्का की है, और यह उस समय नाज़िल हुई थी जब सलात (prayer) और रोज़े (fasting) जैसे कर्तव्यों (obligations) की अनिवार्यता स्थापित नहीं हुई थी (संभवत: मीराज (Miraj) की घटना से पहले)।
यहाँ जो इबादत का ज़िक्र किया गया है, वह अल्लाह और पैग़ंबर मुहम्मद ﷺ के नामों का उच्चारण करने से संबंधित है, जैसे कि कलीमा (Kalima) पढ़ना।
पैग़ंबर मुहम्मद ﷺ के पवित्र चेहरे को प्रेम से देखना पहली और सबसे श्रेष्ठ इबादत मानी जाती है।

मुख्य शिक्षा और मुद्दे (Key Lessons and Issues Derived):

काफ़िरों का इबादत का कर्तव्य (Infidels' Obligation to Worship):
काफ़िरों पर भी अल्लाह की इबादत का कर्तव्य है।
उन्हें इस्लाम (Islam) कबूल करना चाहिए और आवश्यक इबादतें (required worships) अदा करनी चाहिए।

कुफ्र की हालत में इबादत (Worship in the State of Infidelity):
कुफ्र (infidelity) की हालत में की गई इबादत असल इबादत नहीं मानी जाती।
मक्का के काफ़िर तवाफ़ (Tawaaf), हज (Hajj), उमरा (Umrah) करते थे और हाजी यात्रियों की सेवा (service to the pilgrims) करते थे, लेकिन उनका यह अमल उनके इन्कार (disbelief) की वजह से निरर्थक हो जाता था।

पवित्र काबा (The Sacred Ka'bah):
काबा, ईश्वरीय महिमा (Divine splendour) का प्रतीक है और इस्लाम में इसका विशेष महत्व है।

ईश्वरीय महिमा को सृष्टि से जोड़ना (Linking Divine Majesty to Creation):
हालाँकि अल्लाह सभी प्राणियों का रब (Lord of all beings) है, लेकिन उसकी दिव्यता (divinity) को उसकी उच्च सृष्टि (lofty creation) से जोड़ा जाना चाहिए।
इसलिए, यह कहा जाता है: "हे मुस्तफ़ा (the Prophet Muhammad ﷺ) के रब, हे पवित्र काबा के रब (Lord of the Sacred Ka'bah)।"

काबा और क़ुरआन की पवित्रता (Sacred Nature of the Ka'bah and the Qur'an):
हालाँकि काबा पत्थरों और अन्य सामग्री (materials) से बना है, यह अन्य इमारतों की तरह नहीं है।
वैसे ही, भले ही क़ुरआन कागज़ पर स्याही से छापा जाता है, जैसे किसी भी अन्य किताब (book) की तरह, इसका महत्व (significance) और प्रकृति (nature) बेजोड़ है।
यहां तक कि पैग़ंबर खाना खाते और पीते हैं, लेकिन उनकी सार (essence) और ईश्वरीय स्थान (divine status) सामान्य इंसानों से अलग और उच्च है।

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