कुरान - 96:13 सूरह अल-अलाक़ अनुवाद, लिप्यंतरण और तफसीर (तफ्सीर).

13
أَرَءَيۡتَ إِن كَذَّبَ وَتَوَلَّىٰٓ

Transliteration: (Ara-aita in kaz zaba wa ta walla )

13. क्या आपने देखा कि यदि वह इंकार करता है और मुँह मोड़ लेता [14]है (अनुवाद — मुफ़्ती अहमद यार ख़ान)

मुफ़्ती अहमद यार ख़ान — सूरह अल-अलाक़ आयत 13 तफ़सीर



  • मुफ़्ती अहमद यार ख़ान (तफ़सीर-ए-नईमी)

अगर वह झूठा साबित हो और मुँह मोड़े, तो उसका क्या हाल होगा? (Surah Al-Alaq, 96:13-14)

Will You See, If He Belied and Turned Back, Then What Would Be His Condition?

नबी ﷺ के खिलाफ अविश्वास और बगावत का नतीजा (The Consequence of Disbelief and Rebellion Against the Prophet ﷺ)

आयत का संदर्भ और अर्थ (Context and Meaning of the Verse):

यह आयत अबू जहल के बारे में है, जिसने सत्य को नकारा और ईमान से मुँह मोड़ लिया, जबकि वह नबी ﷺ की उपस्थिति में था। आयत यह बताती है कि वह अपने अविश्वास और नाफरमानी के कारण कितनी गंभीर सजा का सामना करेगा।
इस आयत में इशारा किया गया है कि जो लोग नबी ﷺ की मौजूदगी में सत्य को नकारते हैं, उनकी स्थिति उन काफ़िरों से भी बदतर होती है जो इस संदेश को सुनने का मौका नहीं पा सके। जिस तरह अदालत में न्यायाधीश के सामने अपराध करना एक बड़ा अपराध माना जाता है, वैसे ही नबी ﷺ के सामने सत्य को नकारना और उनका विरोध करना कहीं अधिक गंभीर गुनाह है।

मुख्य शिक्षा और संदेश (Key Lessons and Insights):

  • इस आयत में यह बताया गया है कि नबी ﷺ की नाफरमानी केवल व्यक्तिगत नहीं बल्कि सत्य के सामने खुलेआम विरोध करने का कृत्य है।
  • नबी ﷺ को देखकर और उनके सत्य को समझकर भी उन्हें झुठलाना, अविश्वास के पाप को और बढ़ा देता है।

महत्वपूर्ण बिंदु और धार्मिक मुद्दे (Key Takeaways and Religious Issues):

नबी ﷺ की आज्ञाकारिता सभी पर अनिवार्य है (Obedience to the Prophet ﷺ is Mandatory, Even for Non-Believers):

  • नबी ﷺ की आज्ञाकारिता केवल ईमान वालों पर ही नहीं, बल्कि गैर-मुसलमानों पर भी अनिवार्य है।
  • जो लोग नबी ﷺ को झुठलाते और उनकी बातों का विरोध करते हैं, उन्हें विशेष रूप से कड़ी सजा दी जाती है।

नकार और अवज्ञा का दंड (Punishment for Rejection and Disobedience):

  • सत्य को स्वीकार करने के बाद उसे नकारने पर सजा बहुत कठोर होती है।
  • अबू जहल के मामले में, नबी ﷺ को देखने और उनके सत्य को पहचानने के बावजूद उनका विरोध करना, उसे और अधिक गंभीर पापी बनाता है।
  • यह आयत उन पापी मुसलमानों के लिए भी चेतावनी है, जो अल्लाह और नबी ﷺ की आज्ञाओं का पालन नहीं करते। उनके लिए भी दंड तय है, चाहे वे ईमान का दावा करें, लेकिन उनकी नाफरमानी और बगावत उन्हें सजा की ओर ले जाएगी।

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