कुरान - 96:1 सूरह अल-अलाक़ अनुवाद, लिप्यंतरण और तफसीर (तफ्सीर).

1
ٱقۡرَأۡ بِٱسۡمِ رَبِّكَ ٱلَّذِي خَلَقَ

Transliteration: (Iqra bismi rab bikal lazee khalaq )

1. पढ़ें [1] अपने उस रब के नाम [2] से जिसने पैदा किया। (अनुवाद — मुफ़्ती अहमद यार ख़ान)

मुफ़्ती अहमद यार ख़ान — सूरह अल-अलाक़ आयत 1 तफ़सीर



  • मुफ़्ती अहमद यार ख़ान (तफ़सीर-ए-नईमी)

पढ़ें अपने रब के नाम से जिसने पैदा किया (सूरह अल-अलक़, 96:1)

वहज़-ए-नुज़ूल (Reason for Revelation)

पैग़ंबर-ए-इस्लाम ﷺ के नबुव्वत के ऐलान से पहले छह महीने तक सच्चे ख्वाब का सिलसिला जारी रहा। इसके बाद आपने माउंट नूर की गुफा-ए-हिरा में इबादत शुरू की। 17 रमज़ान की सुबह, फ़ज्र के वक़्त, फ़रिश्ता जिब्रील (अलैहिस्सलाम) प्रकट हुए और कहा, "पढ़ो!"
पैग़ंबर ﷺ ने फरमाया, "मैं पढ़ने वाला में से नहीं हूँ"  यह बात तीन बार दोहराई गई। फिर जिब्रील ने आपको मज़बूती से अपने सीने से लगाया और सूरह अल-अलक़ की पहली पांच आयतें नाज़िल कीं। (तफ़्सीर रूहुल बयान)

मुख्य सबक और चिंतन (Key Lessons and Reflections)

तन्हाई (Seclusion) का महत्व

  • तन्हाई दुनिया की ख्वाहिशों और उलझनों से दूर होकर खुदा की तरफ़ रुझान का ज़रिया है।
  • नबी ﷺ और हज़रत मूसा (अलैहिस्सलाम) दोनों को तन्हाई के बाद आसमानी किताबें अता हुईं।

गले लगाना (The Act of Embracing)

  • जिब्रील (अलैहिस्सलाम) का पैग़ंबर ﷺ को गले लगाना रूहानी बरकतों और इल्म के हस्तांतरण का प्रतीक है।
  • यह दिखाता है कि रूहानी राह में मार्गदर्शक का शारीरिक ध्यान भी बड़ा असर डालता है।

नबुव्वत से पहले पैग़ंबर ﷺ का मक़ाम

  • नबुव्वत से पहले ही आप ﷺ अारिफ़ (अल्लाह को जानने वाले), आबिद (इबादत करने वाले), और ज़ाहिद (दुनिया से बेपरवाह) थे।
  • कुरआन ने आपको कभी गुमराह या राह की तलाश में नहीं कहा, बल्कि आपका ऊंचा दर्जा बयान किया।
  • मेराज की रात आप ﷺ ने तमाम नबियों को नमाज़ में इमामत करवाई, जिससे आपका खास मक़ाम और साबित हुआ।

जिब्रील से वाक़फ़ियत (Familiarity with Jibreel)

  • पैग़ंबर ﷺ पहले से ही जिब्रील (अलैहिस्सलाम) से वाक़िफ़ थे, इसलिए उनके ज़ाहिर होने पर आप ﷺ को डर नहीं लगा।
  • यह दिखाता है कि आप ﷺ की रूहानी तैयारी और इल्म पहले से ही बुलंद थी।

"पढ़ो" के हुक्म की समझ (Understanding the Command: "Read")

ज़िक्रुल्लाह (अल्लाह का ज़िक्र)

  • इस हुक्म से ज़िक्र की अहमियत का पता चलता है, जो इबादत की रूह है।
  • रूहानी उस्ताद से इजाज़त लेकर ज़िक्र करने से इसका असर बढ़ जाता है।
  • नबी ﷺ पहले से ज़िक्र में मशगूल थे, लेकिन यहां खुदा की इजाज़त के साथ इसे और प्रभावी बनाने की सीख दी गई।

कुरआन की तिलावत

  • ईमान लाने वालों को तिलावत से पहले तआव्वुज़ (अल्लाह की पनाह मांगना) और तस्मियह (बिस्मिल्लाह कहना) से शुरू करना चाहिए।
  • एक हदीस में फरमाया गया, "हर वह अच्छा काम जो तस्मियह के बगैर शुरू किया जाए, वह अधूरा है।"

अल्लाह के नाम के फायदे (Benefits of Allah’s Name)

  • अल्लाह का नाम लेना बारिश की तरह है, जो धरती को बरकत और रूह को तरक्की देता है।
  • इतिहास में अल्लाह के नाम की बरकत के उदाहरण:
    • हज़रत नूह (अलैहिस्सलाम) का कश्ती सलामती से किनारे लगना।
    • हज़रत सुलेमान (अलैहिस्सलाम) का खत "बिस्मिल्लाह" से शुरू होना, जिससे यमन पर उनका राज कायम हुआ।

Sign up for Newsletter

×

Download Our Quran App

For a faster and smoother experience,
install our mobile app now.

Download Now