Transliteration: (Wa hum yanhawna 'anhu wa yan'awna 'anhu wa iny yuhlikoona illaa anfusahum wa maa yash'uroon)
ये आयत उन मुसर्रिफ़ मुषरिकों के बारे में है
जो न सिर्फ़ ख़ुद ईमान से दूर रहे, बल्कि दूसरों को भी रोकते रहे —
रसूलुल्लाह ﷺ की मजलिसों में जाने से, क़ुरआन सुनने से।
हज़रत अब्दुल्लाह इब्न अब्बास (र.अ.) के मुताबिक,
इसमें अबू तालिब का भी इशारा है —
जो नबी ﷺ को क़ुरैश के सतावे से बचाते तो थे,
मगर ख़ुल्लम-ख़ुल्ला ईमान नहीं लाए।
ऐसे लोग, चाहे जान-बूझकर या बेख़बरी में,
सबसे ज़्यादा नुकसान अपनी ही जानों को पहुँचा रहे हैं,
मगर उन्हें इसका एहसास तक नहीं होता।
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