Transliteration: (Alhamdu lillaahil lazee khalaqas samaawaati wal arda wa ja'alaz zulumaati wannoor; summal lazeena kafaroo bi Rabbihim ya'diloon)
क़ुरआन हमेशा “आसमानों” को बहुवचन और “ज़मीन” को एकवचन में बयान करता है, क्योंकि ज़मीन की परतें आपस में जुड़ी हुई हैं, जबकि आसमान सात होकर भी एक-दूसरे से अलग-अलग हैं। यह इलाही बयान में पूर्ण सटीकता का सुबूत है, कोई विरोधाभास नहीं।
आयत में “अंधेरे” को बहुवचन और “रोशनी” को एकवचन में लाया गया है, जिससे ये हक़ीक़त सामने आती है कि गुमराही की राहें बहुत सारी होती हैं, लेकिन हिदायत (सच्चाई) एक ही है। जैसे दुनिया में अंधेरे की कई शक्लें होती हैं, वैसे ही कुफ़्र और गुनाह की भी बहुत सी शक्लें हैं, जबकि सच्चा रास्ता एक है — अल्लाह की रोशनी।
शिर्क करने से पहले इंसान दिल में बराबरी का एक झूठा गुमान पालता है। मक्का के मुशरिक फ़रिश्तों को अल्लाह की बेटियाँ मानते थे, और ईसाई हज़रत ईसा (अलैहिस्सलाम) को अल्लाह का बेटा।
वे मख़लूक को ख़ालिक़ का हिस्सा समझते हुए पूजा करते थे, लेकिन मोमिनों का यक़ीन होता है कि नबी और औलिया सब अल्लाह के बंदे हैं, न कि उसके बराबर।
इसलिए इस आयत को मुसलमानों पर लागू करना ग़लत और गुमराह करने वाला है।
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