कुरान - 6:7 सूरह अल-अनाम अनुवाद, लिप्यंतरण और तफसीर (तफ्सीर).

7
وَلَوۡ نَزَّلۡنَا عَلَيۡكَ كِتَٰبٗا فِي قِرۡطَاسٖ فَلَمَسُوهُ بِأَيۡدِيهِمۡ لَقَالَ ٱلَّذِينَ كَفَرُوٓاْ إِنۡ هَٰذَآ إِلَّا سِحۡرٞ مُّبِينٞ

Transliteration: (Wa law nazzalnaa 'alaika Kitaaban fee qirtaasin falamasoohu bi aideehim laqaalal lazeena kafarooo in haazaaa illaa sihrum mubeen)

और (ऐ नबी!) अगर हम आप पर कोई किताब काग़ज़ में लिखकर भी नाज़िल कर देते, फिर वे उसे अपने हाथों से छू भी लेते, तब भी ये काफ़िर कहते: "यह तो खुला जादू ही है" [15]। (अनुवाद — मुफ़्ती अहमद यार ख़ान)

मुफ़्ती अहमद यार ख़ान — सूरह अल-अनाम आयत 7 तफ़सीर



  • मुफ़्ती अहमद यार ख़ान (तफ़सीर-ए-नईमी)

📖 सूरा अल-अनआम – आयत 7 की तफ़्सीर

✅ [15] इनकार करने वालों की हठधर्मी

इस आयत का सम्बंध उन काफ़िरों से है जैसे नज़र बिन हारिस, अब्दुल्लाह बिन उमय्यह, और नौफल बिन खुवैलिद, जो कहते थे कि अगर वाक़ई ये क़ुरआन अल्लाह की किताब है, तो लिखी हुई शक्ल में नाज़िल क्यों नहीं होती, और फ़रिश्ते आकर उसकी गवाही क्यों नहीं देते?

अल्लाह फ़रमा रहा है कि अगर हम वाक़ई उनकी माँगी हुई चीज़ भी दे दें — किताब लिखकर, उनके हाथों में छूने लायक बना दें — तब भी ये उसे "खुला जादू" कहकर इंकार करेंगे।

यह इस बात का सबूत है कि उनका इनकार हक़ को समझने में कमी नहीं, बल्कि ज़िद, घमंड और हठधर्मी की वजह से है।
चाँद का दो टुकड़े होना, पत्थरों का तस्बीह पढ़ना, जैसी बहुत सी निशानियाँ वो पहले ही देख चुके थे — मगर फिर भी उन्हें "जादू" ही कहा।

👉 यानी, इनके सवालात हक़ तलाशने के लिए नहीं, बल्कि टालने के लिए थे।

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