Transliteration: (Qul yaaa aiyuhan naasu innee Rasoolul laahi ilaikum jamee'anil lazee lahoo mulkus samaawaati wal ardi laaa ilaaha illaa Huwa yuhyee wa yumeetu fa aaminoo billaahi wa Rasoolihin Nabiyyil ummiy yil lazee yu'minu billaahi wa Kalimaatihee wattabi'oohu la'allakum tahtadoon)
यहाँ रसूलुल्लाह ﷺ को पूरी इंसानियत के लिए भेजे जाने का एलान है। अल्लाह तआला ने फ़रमाया: "ताकि वह तमाम जहानों के लिए डर सुनाने वाला बने।" (फ़ुरक़ान 25:1) यानी आपकी दावत और इन्कार पर अज़ाब का हुक्म हर इंसान पर लागू है।
यह नदा सिर्फ़ उस वक़्त के लोगों तक महदूद नहीं, बल्कि क़यामत तक आने वाली पूरी इंसानियत के लिए है। तमाम अन्बिया से अल्लाह ने अहद लिया था कि अगर आख़िरी नबी आएँ तो उनकी तस्दीक़ और मदद करेंगे। (आल-ए-इमरान 3:81)
जैसे अल्लाह की हुकूमत आसमानों और ज़मीन पर है, वैसे ही नबी ﷺ का पैग़ाम भी हर क़ौम और हर जगह के लिए है। यह उनकी रिसालत की आलमी हैसियत का सबूत है।
"उम्मी" का मतलब यह है कि नबी ﷺ ने किसी इंसान से पढ़ाई नहीं की, बल्कि अल्लाह ने उन्हें सीधे इल्म अता फ़रमाया। यानी वह बिना उस्ताद के पैदा ही इल्म वाले थे, और फिर सारी इंसानियत के उस्ताद बने।
रसूलुल्लाह ﷺ का ईमान अल्लाह और उसकी कलिमात पर सीधा है। बाक़ी लोग उनका वसीला पकड़कर ईमान लाते हैं। इसलिए उम्मत को चाहिये कि रसूल ﷺ की इताअत पूरी तरह करें, जैसे ग़ुस्ल देने वाले के सामने मय्यत बिला इख़्तियार हो जाती है। यही सच्चा ईमान और हिदायत है।
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