कुरान - 7:156 सूरह अल-आराफ अनुवाद, लिप्यंतरण और तफसीर (तफ्सीर).

156
۞وَٱكۡتُبۡ لَنَا فِي هَٰذِهِ ٱلدُّنۡيَا حَسَنَةٗ وَفِي ٱلۡأٓخِرَةِ إِنَّا هُدۡنَآ إِلَيۡكَۚ قَالَ عَذَابِيٓ أُصِيبُ بِهِۦ مَنۡ أَشَآءُۖ وَرَحۡمَتِي وَسِعَتۡ كُلَّ شَيۡءٖۚ فَسَأَكۡتُبُهَا لِلَّذِينَ يَتَّقُونَ وَيُؤۡتُونَ ٱلزَّكَوٰةَ وَٱلَّذِينَ هُم بِـَٔايَٰتِنَا يُؤۡمِنُونَ

Transliteration: (Waktub lanaa fee haazi hid dunyaa hasanatanw wa fil Aakhirati innaa hudnaaa ilaik; qaala 'azaabee useebu bihee man ashaaa'u wa rahmatee wasi'at kulla shai'; fasa aktubuhaa lil lazeena yattaqoona wa yu'toonaz Zakaata wal lazeena hum bi Aayaatinaa yu'minoon)

“और हमारे लिए इस दुनिया [343] में भी भलाई लिख दे और आख़िरत में भी। बेशक हम तेरी ही तरफ़ रुजू करते हैं [344]।”
अल्लाह ने फ़रमाया: “मेरा अज़ाब मैं जिस पर चाहूँ डाल दूँ [345], और मेरी रहमत हर चीज़ को घेरे हुए है [346]। तो मैं अपनी रहमत उन्हें ही लिखूँगा जो तक़वा इख़्तियार करें, ज़कात अदा करें और हमारी निशानियों पर ईमान लाएँ [347]।” (अनुवाद — मुफ़्ती अहमद यार ख़ान)

मुफ़्ती अहमद यार ख़ान — सूरह अल-आराफ आयत 156 तफ़सीर



  • मुफ़्ती अहमद यार ख़ान (तफ़सीर-ए-नईमी)

📖 सूरा अल-आ‘राफ़ – आयत 156 की तफ़्सीर

✅ दुनिया व आख़िरत की भलाई की दुआ [343]

हज़रत मूसा (अलैहिस्सलाम) ने दुआ की कि अल्लाह दुनिया में भी हमें हिदायत, इज़्ज़त और क़दर दे और आख़िरत में मग़फ़िरत और इज़्ज़त बख़्शे।

✅ नबी का क़ौम की तरफ़ से दुआ करना [344]

यह दुआ या तो सत्तर साथियों के लिए थी या पूरी बनी इस्राईल की तरफ़ से। इससे साबित होता है कि अंबिया अपनी उम्मत की तरफ़ से दुआ व शफ़ाअत करते हैं।

✅ दुआ की शर्तों के साथ क़बूलियत [345]

अल्लाह ने फ़रमाया कि दुआ तो क़बूल हुई, लेकिन हर एक के लिए नहीं, बल्कि उनके लिए जो नेक अमल करें।

✅ रहमत का आम होना और सवाब का ख़ास होना [346]

अल्लाह की रहमत दुनिया में सबको मिलती है – रिज़्क़, अम्न व सलामती। लेकिन आख़िरत का सवाब सिर्फ़ मोमिनों और मुत्तक़ी लोगों के लिए है।

✅ उम्मते मुहम्मद ﷺ की फ़ज़ीलत [347]

यह वादा हज़रत मुहम्मद ﷺ की उम्मत के लिए है, जो तक़वा करते हैं, ज़कात अदा करते हैं और ईमान लाते हैं। इनकी खूबियाँ पिछली किताबों में भी लिखी थीं और इनके ऐब छुपाए गए। यही अल्लाह के महबूब ﷺ की उम्मत है।

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