Transliteration: (Wakhtaara Moosaa qawmahoo sab'eena rajulal li meeqaatinaa falammaa akhazat humur rajfatu qaala Rabbi law shi'ta ahlaktahum min qablu wa iyyaay; 'a tuhlikuna bimaa fa'alas sufahaaa'u minaa in hiya illaa fitnatuka tudillu bihaa man tashaaa'u wa tahdee man tashaaa; Anta waliyyunaa faghfir lanaa warhamnaa wa Anta khairul ghaafireen)
जब हज़रत मूसा (अलैहिस्सलाम) पहली बार तौरात लेने गए तो बनी इसराईल की बारह क़ौमों में से सत्तर आदमी चुने। दो ज़्यादा थे तो उन्हें पीछे छोड़ दिया गया, और उन्हें भी अज्र का वादा किया गया। इस तरह ठीक सत्तर लोग उनके साथ तूर पहाड़ की तरफ़ गए।
तूर सीनाई पर जब हज़रत मूसा (अलैहिस्सलाम) कलामे-इलाही में मशग़ूल थे तो अचानक ज़लज़ला आया और वे सत्तर आदमी मर गए। एक तफ़्सीर में है कि उन्होंने अल्लाह का दीदार चाहा था। दूसरी तफ़्सीर में है कि उनमें कुछ लोग अभी भी बछड़े की पूजा करने वालों से अलग न हुए थे, इसी वजह से अजाब आया।
हज़रत मूसा (अलैहिस्सलाम) ने यह दुआ इसलिए की कि अगर वह अकेले लौटते तो लोग समझते कि उन्होंने ही इनको मार डाला। उन्होंने अल्लाह से इज़्ज़त और सफ़ाई की गुज़ारिश की। इससे मालूम होता है कि वे लोग सचमुच मर गए थे, सिर्फ़ बेहोश नहीं हुए थे, और उनमें से सिर्फ़ कुछ गुनहगार थे।
उनका अल्लाह को देखने की तमन्ना करना, या गुनाहगारों से दूरी न बनाना, या उसी मुक़ाम पर मौजूद होना – सब अल्लाह की आज़माइश थी। इससे साबित होता है कि अल्लाह जिसे चाहे कामयाब करता है और जिसे चाहे नाकाम कर देता है।
इस वाक़ए से दो बड़ी बातें सामने आती हैं:
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