कुरान - 2:113 सूरह अल-बक़रा अनुवाद, लिप्यंतरण और तफसीर (तफ्सीर).

113
وَقَالَتِ ٱلۡيَهُودُ لَيۡسَتِ ٱلنَّصَٰرَىٰ عَلَىٰ شَيۡءٖ وَقَالَتِ ٱلنَّصَٰرَىٰ لَيۡسَتِ ٱلۡيَهُودُ عَلَىٰ شَيۡءٖ وَهُمۡ يَتۡلُونَ ٱلۡكِتَٰبَۗ كَذَٰلِكَ قَالَ ٱلَّذِينَ لَا يَعۡلَمُونَ مِثۡلَ قَوۡلِهِمۡۚ فَٱللَّهُ يَحۡكُمُ بَيۡنَهُمۡ يَوۡمَ ٱلۡقِيَٰمَةِ فِيمَا كَانُواْ فِيهِ يَخۡتَلِفُونَ

Transliteration: (Wa qaalatil Yahoodu laisatin Nasaaraa 'alaa shai'inw-wa qaalatin Nasaaraaa laisatil Yahoodu 'alaa shai'inw'wa hum yatloonal Kitaab; kazaalika qaalal lazeena la ya'lamoona misla qawlihim; fallaahu yahkumu bainahum Yawmal Qiyaamati feemaa kaanoo feehi yakhtalifoon)

"यहूदी कहते हैं: ‘नसारा के पास कोई ठोस आधार नहीं है।’ और नसारा कहते हैं: ‘यहूदियों के पास कोई आधार नहीं है,’ हालाँकि वे किताब पढ़ते हैं। इसी प्रकार अनपढ़ लोग भी उनके जैसे ही बातें करते हैं। लेकिन अल्लाह कयामत के दिन उनके बीच उस विषय पर फैसला करेगा जिसमें वे विवाद कर रहे हैं।" (अनुवाद — मुफ़्ती अहमद यार ख़ान)

मुफ़्ती अहमद यार ख़ान — सूरह अल-बक़रा आयत 113 तफ़सीर



  • मुफ़्ती अहमद यार ख़ान (तफ़सीर-ए-नईमी)

[225] यहूद और नसारा का पैग़म्बर ﷺ के सामने विवाद

  • एक बार नज़रान के नसारा (मसीही) और मदीना के यहूद के बीच पैग़म्बर मुहम्मद ﷺ की मौजूदगी में तीव्र बहस हुई।
  • दोनों समुदाय अपने धर्म को श्रेष्ठ बताते हुए दूसरे के धर्म को खारिज करते थे।
  • इस बहस के जवाब में यह आयत उतरी, जो उनकी आपसी विरोधाभास और बिना आधार के श्रेष्ठता के दावों को उजागर करती है।

[226] अपने ही पवित्र ग्रंथों के विरुद्ध बात करना

  • यहूद तो तौरा पढ़ते हैं, और नसारा ईन्जील पढ़ते हैं, जो क्रमशः हजरत मूसा (अ.स) और हजरत ईसा (अ.स) की सच्चाई को मानते हैं।
  • फिर भी वे एक-दूसरे के पैग़म्बरों को स्वीकार नहीं करते।
  • इस आयत में उनका यह विरोधाभास दिखाया गया है कि यदि वे सचमुच अपने ही ग्रंथों पर ईमान रखते, तो वे एक-दूसरे के पैग़म्बरों को भी मानते।
  • अल्लाह उनकी इस असंगति को नकार रहा है।

[227] अल्लाह कयामत के दिन इन विवादों का न्याय करेगा — मुसलमान इनसे अलग हैं

  • यह ध्यान देना जरूरी है कि नसारा और यहूद दोनों पर अल्लाह ने दंड भी भेजा क्योंकि उन्होंने एक-दूसरे के पैग़म्बरों को नकारा।
  • लेकिन मुसलमान सभी पैग़म्बरों का सम्मान करते हैं, जिनमें मूसा (अ.स), ईसा (अ.स) और मुहम्मद ﷺ शामिल हैं।
  • इस ईमान के कारण मुसलमान नसारा और यहूद के इस विशेषवादी दावे का खंडन करते हुए भी किसी विरोधाभास में नहीं पड़ते।
  • इस आयत में मुसलमानों और पिछले समुदायों के बीच एक बड़ा फर्क स्पष्ट किया गया है।

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