Transliteration: (Wa iz qaala Ibraaheemu Rabbij 'al haazaa baladan aaminanw warzuq ahlahoo minas samaraati man aamana minhum billaahi wal yawmil aakhiri qaala wa man kafara faumatti'uhoo qaleelan summa adtarruhooo ilaa 'azaabin Naari wa bi'salmaseer)
📖 सूरह अल-बक़रह – आयत 126
"और (याद करो) जब इब्राहीम ने दुआ की: 'हे मेरे रब! इस शहर को सलामती का ठिकाना बना दे [255] और इसके लोगों को फल-फूल दे—उनमें से जो अल्लाह और आख़िरी दिन पर ईमान रखते हैं।' उन्होंने (अल्लाह) कहा: 'और जो कोई काफिर होगा, मैं उसे [256] थोड़े समय के लिए दुनिया की खुशी दूंगा, फिर उसे आग की सज़ा में धकेल दूंगा, और कितना बुरा वह ठिकाना है।'"
✅ [255] अच्छे कामों के बाद दुआ करना नबी की सजीव परंपरा है
यह आयत दिखाती है कि अपने अमल की स्वीकार्यता और भलाई के लिए दुआ करना एक प्रशंसनीय पैगंबरी रिवाज है।
हज़रत इब्राहीम (अलैहिस्सलाम):
🕊️ इससे हमें पता चलता है:
✅ [256] अल्लाह का जवाब: शर्तों पर वरदान और अन्तिम न्याय
हज़रत इब्राहीम की दुआ पर अल्लाह ने एक शर्त के साथ स्वीकार किया।
📌 यह हमें सिखाता है कि:
🛡️ इसलिए, अल्लाह का न्याय सुनिश्चित करता है कि:
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