कुरान - 2:126 सूरह अल-बक़रा अनुवाद, लिप्यंतरण और तफसीर (तफ्सीर).

126
وَإِذۡ قَالَ إِبۡرَٰهِـۧمُ رَبِّ ٱجۡعَلۡ هَٰذَا بَلَدًا ءَامِنٗا وَٱرۡزُقۡ أَهۡلَهُۥ مِنَ ٱلثَّمَرَٰتِ مَنۡ ءَامَنَ مِنۡهُم بِٱللَّهِ وَٱلۡيَوۡمِ ٱلۡأٓخِرِۚ قَالَ وَمَن كَفَرَ فَأُمَتِّعُهُۥ قَلِيلٗا ثُمَّ أَضۡطَرُّهُۥٓ إِلَىٰ عَذَابِ ٱلنَّارِۖ وَبِئۡسَ ٱلۡمَصِيرُ

Transliteration: (Wa iz qaala Ibraaheemu Rabbij 'al haazaa baladan aaminanw warzuq ahlahoo minas samaraati man aamana minhum billaahi wal yawmil aakhiri qaala wa man kafara faumatti'uhoo qaleelan summa adtarruhooo ilaa 'azaabin Naari wa bi'salmaseer)

126. और (याद करो) जब इब्राहीम ने दुआ की: "हे मेरे रब! इस शहर को सलामती का ठिकाना बना दे [255] और इसके लोगों को फल-फूल दे—उनमें से जो अल्लाह और आख़िरी दिन पर ईमान रखते हैं।" उन्होंने (अल्लाह) कहा: "और जो कोई काफिर होगा, मैं उसे [256] थोड़े समय के लिए दुनिया की खुशी दूंगा, फिर उसे आग की सज़ा में धकेल दूंगा, और कितना बुरा वह ठिकाना है।" (अनुवाद — मुफ़्ती अहमद यार ख़ान)

मुफ़्ती अहमद यार ख़ान — सूरह अल-बक़रा आयत 126 तफ़सीर



  • मुफ़्ती अहमद यार ख़ान (तफ़सीर-ए-नईमी)

📖 सूरह अल-बक़रह – आयत 126
"और (याद करो) जब इब्राहीम ने दुआ की: 'हे मेरे रब! इस शहर को सलामती का ठिकाना बना दे [255] और इसके लोगों को फल-फूल दे—उनमें से जो अल्लाह और आख़िरी दिन पर ईमान रखते हैं।' उन्होंने (अल्लाह) कहा: 'और जो कोई काफिर होगा, मैं उसे [256] थोड़े समय के लिए दुनिया की खुशी दूंगा, फिर उसे आग की सज़ा में धकेल दूंगा, और कितना बुरा वह ठिकाना है।'"

✅ [255] अच्छे कामों के बाद दुआ करना नबी की सजीव परंपरा है
यह आयत दिखाती है कि अपने अमल की स्वीकार्यता और भलाई के लिए दुआ करना एक प्रशंसनीय पैगंबरी रिवाज है।
हज़रत इब्राहीम (अलैहिस्सलाम):

  • मक्का की सलामती और शांति के लिए दुआ करते हैं
  • उसके लोगों, विशेषकर जो अल्लाह और आख़िरी दिन पर ईमान रखते हैं, के लिए रोज़ी और फल की मांग करते हैं

🕊️ इससे हमें पता चलता है:

  • नेक कामों के बाद दुआ करना (जैसे जनाज़ा की नमाज़ के बाद या इफ़्तार पर) मुबारक और वाजिब है, क्योंकि यह अल्लाह की स्वीकार्यता की दुआ है।

✅ [256] अल्लाह का जवाब: शर्तों पर वरदान और अन्तिम न्याय
हज़रत इब्राहीम की दुआ पर अल्लाह ने एक शर्त के साथ स्वीकार किया।

  • मुमिन दोनों दुनियाओं में बरकत पाएंगे।
  • काफिरों को भी थोड़े समय के लिए दुनियावी खुशियाँ दी जाएंगी, लेकिन अंततः:
    "मैं उन्हें आग की सज़ा में डाल दूंगा, और कितना बुरा वह ठिकाना है।"

📌 यह हमें सिखाता है कि:

  • कभी-कभी अल्लाह अपने नबियों की दुआ को अपनी حکمت के अनुसार संशोधित करके स्वीकार करता है।
  • संशोधित स्वीकारोक्ति भी स्वीकारोक्ति ही है, अस्वीकार नहीं।

🛡️ इसलिए, अल्लाह का न्याय सुनिश्चित करता है कि:

  • मुमिन हमेशा के लिए बरकत का आनंद लें।
  • काफिर, भले ही अस्थायी खुशियाँ पाएं, परन्तु आख़िरत में कड़ी सज़ा पाएंगे।

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