Transliteration: (Wa izaa qeela lahum aaminoo kamaaa aamanan naasu qaalooo anu'minu kamaaa aamanas sufahaaa'; alaaa innahum humus sufahaaa'u wa laakil laa ya'lamoon)
आयत का पूरा अनुवाद:
13. और जब उनसे कहा जाता है, “ईमान लाओ जैसे औरों ने ईमान लाया,” तो वो कहते हैं, “क्या हम वैसे ईमान लाएं जैसे बेवकूफ़ों ने ईमान लाया?” ख़बरदार, यक़ीनन वही लोग बेवकूफ़ हैं, लेकिन वो जानते नहीं। [28]
अगर “लोगों” से मुराद नबी ﷺ के सहाबा हैं, तो सच्चा ईमान वही है जो उन्होंने अपनाया। जो कोई उनसे हटता है, वो सच्चा मोमिन नहीं बल्कि धोखेबाज़ है।
अगर “लोगों” से मुराद आम मुसलमान हैं, तो मतलब यह है कि जो रास्ता मुसलमानों — ख़ासकर बहुसंख्यक — ने अपनाया है, वही सही है।
हदीस कहती है: “जो मुसलमान अच्छा समझें, अल्लाह भी उसे अच्छा समझता है।”
मुनाफिक़ लोग हमेशा नेक लोगों को बेवकूफ़ कहते हैं। राफ़ज़ी सहाबा को बुरा कहते हैं, ख़ारिज़ी अहल-ए-बैत को, ग़ैर मुक़ल्लिद इमाम अबू हनीफ़ा को और वहाबी औलिया को — इस आयत के ज़रिए इन सबको चेतावनी दी गई है।
अल्लाह ने ख़ुद मुनाफिक़ों को बेवकूफ़ कहा — यानी उनके पास अक़्ल नहीं है, चाहे वो खुद को होशियार समझें।
बेज़ार और बेदीन लोग उलमा की बेज़ती करते हैं। लेकिन उलमा को ये सोचकर डटे रहना चाहिए कि ऐसा पहले भी होता रहा है।
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