कुरान - 2:14 सूरह अल-बक़रा अनुवाद, लिप्यंतरण और तफसीर (तफ्सीर).

14
وَإِذَا لَقُواْ ٱلَّذِينَ ءَامَنُواْ قَالُوٓاْ ءَامَنَّا وَإِذَا خَلَوۡاْ إِلَىٰ شَيَٰطِينِهِمۡ قَالُوٓاْ إِنَّا مَعَكُمۡ إِنَّمَا نَحۡنُ مُسۡتَهۡزِءُونَ

Transliteration: (Wa izaa laqul lazeena aamanoo qaalooo aamannaa wa izaa khalaw ilaa shayaateenihim qaalooo innaa ma'akum innamaa nahnu mustahzi'oon)

14. और जब वे मोमिनों से मिलते हैं, तो कहते हैं, "हम ईमान लाए," लेकिन जब अपने शैतानों के साथ अकेले होते हैं, तो कहते हैं, "हम तो तुम्हारे साथ हैं; हम तो सिर्फ़ मज़ाक कर रहे थे।" [29] (अनुवाद — मुफ़्ती अहमद यार ख़ान)

मुफ़्ती अहमद यार ख़ान — सूरह अल-बक़रा आयत 14 तफ़सीर



  • मुफ़्ती अहमद यार ख़ान (तफ़सीर-ए-नईमी)

[29] मुनाफ़िक़ों की छुपी हुई आदतें

इस आयत से तीन अहम सबक सामने आते हैं:

✅ 29.1 मुनाफिक़ शैतानों जैसे होते हैं

अल्लाह के नज़दीक मुनाफ़िक़ शैतानों जैसे हैं।
जो लोग उनका अदब करते हैं या उनसे कोई फायदा चाहते हैं, वो असल में शैतान की इज़्ज़त कर रहे होते हैं।

✅ 29.2 मुसलमानों के बीच छुप कर गालियाँ देना

यह मुनाफ़िक़ी की निशानी है कि मुसलमानों की बैठकों में पीठ पीछे गाली या मज़ाक किया जाए।

✅ 29.3 शरीअत का मज़ाक उड़ाना कुफ्र है

इस्लामी क़ानून या जो लोग उसे मानते हैं — उनका मज़ाक उड़ाना खुला कुफ्र (इनकार) है।
ऐसा मज़ाक इंसान को इस्लाम से बाहर कर देता है।

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